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हड्डियों में दर्द को न करें नज़रअंदाज, यह ‘हड्डी का टीबी’ भी हो सकता है

Updated at : 10 Aug 2025 8:42 PM (IST)
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हड्डियों में दर्द को न करें नज़रअंदाज, यह ‘हड्डी का टीबी’ भी हो सकता है

, यह ‘हड्डी का टीबी’ भी हो सकता है

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-टीबी मुक्त भारत के लिए जिला स्वास्थ्य विभाग का प्रयास, “निक्षय पोषण योजना” से मरीजों को बड़ा सहारा किशनगंज

जिला स्वास्थ्य विभाग लगातार जनजागरूकता, उपचार और सहायता योजनाओं को प्राथमिकता दे रहा है. टीबी केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हड्डियों और जोड़ों को भी अपनी चपेट में ले सकती है. हड्डियों में लगातार दर्द, सूजन या असामान्य बदलाव को हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि यह हड्डी का टीबी हो सकता है, जो विकलांगता तक पहुंचा सकता है.

हड्डी के टीबी के लक्षण और खतरे

यक्ष्मा नियंत्रण पदाधिकारी डॉ मंजर आलम ने बताया कि हड्डी का टीबी अधिकतर कूल्हे, घुटने, रीढ़, कोहनी और टखनों जैसे बड़े जोड़ों को प्रभावित करता है. शुरुआती दौर में यह हल्के दर्द या सूजन के रूप में दिखाई देता है, लेकिन धीरे-धीरे यह दर्द बढ़ता है और प्रभावित जोड़ों में कठोरता या विकृति आ सकती है. उन्होंने कहा कि यह बीमारी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक बैक्टीरिया से होती है, जो शरीर में पहले से मौजूद संक्रमण के पुनः सक्रिय होने पर हड्डियों तक फैल सकता है. समय रहते इलाज न मिलने पर यह स्थिति गंभीर हो जाती है और मरीज को चलने-फिरने में कठिनाई होने लगती है.यदि समय पर पहचान हो जाए, तो दवाओं से यह बीमारी पूरी तरह ठीक हो सकती है, लेकिन देर से पहचान होने पर कई बार सर्जरी ही एकमात्र विकल्प रह जाता है.

पहचान और उपचार में सावधानी जरूरी

डॉ आलम ने बताया कि हड्डी के टीबी में जोड़ों में लगातार दर्द, रीढ़ में कूबड़, पीठ और वक्षीय क्षेत्र में बेचैनी, हड्डियों की असामान्यता और बच्चों में हाथ-पैर का टेढ़ा-मेढ़ा होना आम लक्षण हैं. ऐसे मामलों में तुरंत जांच कराना बेहद जरूरी है. शुरुआती अवस्था में छह से आठ महीने की दवा से इलाज संभव है. बच्चों में रिकेट्स की स्थिति में दवाओं और विटामिन की खुराक से लाभ मिलता है, जबकि बर्जर डिजीज में धूम्रपान छोड़ना और खून को पतला करने की दवाएं कारगर होती हैं.

निक्षय पोषण योजना से मरीजों को बड़ा सहारा

सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी ने कहा कि टीबी मरीजों के इलाज के दौरान उचित पोषण बेहद जरूरी है, ताकि उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे. इस दिशा में “निक्षय पोषण योजना” बहुत कारगर साबित हो रही है. योजना के तहत प्रत्येक मरीज को इलाज की अवधि के दौरान प्रतिमाह ₹1000 की सहायता राशि सीधे बैंक खाते में आठ महीने तक दी जाती है. योजना के अंतर्गत निजी चिकित्सकों को मरीज की सूचना देने और इलाज पूरा होने पर ₹500-₹500 की प्रोत्साहन राशि दी जाती है. वहीं ट्रीटमेंट सपोर्टर को भी मरीज के छह माह में ठीक हो जाने पर एक हजार और मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) मरीज के ठीक होने पर पांच हजार की प्रोत्साहन राशि मिलती है. यदि कोई आम नागरिक टीबी के संदिग्ध मरीज को अस्पताल लाता है और जांच में बीमारी की पुष्टि होती है, तो उसे भी पांच सौ रुपये प्रदान किए जाते हैं. यह योजना न केवल मरीजों को आर्थिक सहारा देती है, बल्कि उन्हें इलाज के प्रति नियमित और जिम्मेदार भी बनाती है.

जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव

जिला स्वास्थ्य विभाग ने सभी नागरिकों से अपील की है कि हड्डियों में लगातार दर्द, सूजन या असामान्य बदलाव को अनदेखा न करें और तुरंत नजदीकी सरकारी अस्पताल में जांच कराएं. हम सबकी जिम्मेदारी है कि टीबी से जुड़े भ्रम और भेदभाव को खत्म करें, मरीज को मानसिक और सामाजिक सहारा दें.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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