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पांचवे प्रयास में रिकॉर्ड मतों के अंतर से विजयी रहे थे असरारूल

किशनगंज लोकसभा क्षेत्र के लिए हुए अब तक के सभी चुनावों में सबसे ज्यादा मतों से चुनाव जीतने वाले मौलाना असरारुल हक कासमी को सबसे पहली सफलता अपने पांचवे चुनाव में मिली थी

बच्छराज नखत, ठाकुरगंज.किशनगंज लोकसभा क्षेत्र के लिए हुए अब तक के सभी चुनावों में सबसे ज्यादा मतों से चुनाव जीतने वाले मौलाना असरारुल हक कासमी को सबसे पहली सफलता अपने पांचवे चुनाव में मिली थी. हालांकि 2009 के चुनाव में पहली बार सांसद बने असरारुल हक़ कासमी के उस चुनाव में हारजीत का मार्जिन केवल 80269 था. लेकिन उसके पांच साल बाद नरेंद्र मोदी की लहर के बीच हुए 2014 के चुनाव में मौलाना असरारुल हक़ कासमी ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी भाजपा के दिलीप जायसवाल को 194612 मतों से मात दी थी.

1985 के उप चुनाव में पहली बार चुनावी मैदान में उतरे थे मौलाना

1984 में तीसरी बार किशनगंज के सांसद के बनने के बाद जमीलुर रहमान जब वापस अपने गृह जिला अररिया जा रहे थे, एक सड़क हादसे में बुरी तरह घायल हो गए. अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई . इस वजह से 1985 में किशनगंज लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ. इस चुनाव में कांग्रेस ने मौलाना मोहम्मद असरारुल हक क़ासमी को मैदान में उतारा. मौलाना पहली बार चुनावी मैदान में उतरे थे. वही उनके सामने पूर्व आईएफएस और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के बड़े नेता के रूप में उभरे सैयद शहाबुद्दीन जनता दल के टिकट पर मैदान में थे. इस चुनाव में सैयद शहाबुद्दीन को 2,12,423 वोट मिले, वहीं 1,38,731 वोट लाकर असरारुल हक दूसरे स्थान पर रहे.

1989 में निर्दलीय मैदान में उतरे मौलाना

1989 में कांग्रेस के एमजे अकबर ने 1,78,556 वोट लाकर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे असरारुल हक को पराजित किया. इस चुनाव में असरारुल हक को 1,52,565 और जनता दल के मुन्ना मुस्ताक को 1,39,992 मत हासिल हुए. 1991 के बाद असराररूल हक़ ने चुनावी राजनीती से थोडा विराम ले लिया और 1991 के साथ 1996 का चुनाव नहीं लड़ा. लेकिन 1998 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के सिम्बल पर मैदान में उतरे असरारुल हक़ कासमी को हराकर तस्लिमुदीन किशनगंज के सांसद बने , इस चुनाव में हारजीत का आंकड़ा अब तक के चुनाव के सबसे कम हारजीत के आंकड़े में सुमार हुआ. मात्र 6488 वोटो से असरारुल हक़ कासमी पराजित हुए. असरारुल हक़ को मिले वोटो ने भाजपा की राह आसान कर दी थी.

1999 के चुनाव में पुन

पार्टी बदल कर असरारुल हक़ कासमी मैदान में उतरे. एनसीपी के घड़ी छाप से मैदान में उतरे असरारुल हक़ तीसरे स्थान पर तो जरुर रहे. लेकिन वोटों के बंटवारे ने इस मुस्लिम बहुल किशनगंज से पहली बार भाजपा को जीत दिलवा दी. 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार सैयद शाहनवाज़ हुसैन ने राजद के मो तस्लीमुद्दीन को 8,648 वोटों के छोटे अंतर से हराया. चुनाव में सैयद शाहनवाज को 2,58,035 और तस्लीमुद्दीन को 2,49,387 वोट प्राप्त हुए थे. वही असरारुल हक़ कासमी को 197478 वोट मिले थे. तस्लीमुद्दीन और असरारूल हक कासमी के बीच हुए वोटों के बंटवारे से सीधा फायदा भाजपा को मिला और अब तक के इतिहास में पहली बार किशनगंज संसदीय क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार जीत पाया.

2009 में पहली बार मौलाना को मिली जीत

2004 के चुनाव में मैदान में नहीं उतरने के बाद 2009 के चुनावी मैदान में पुनः मौलाना असरारुल हक़ कासमी मैदान में उतरे और इस बार मतदाताओं ने उन्हें जीत की माला पहना दी. कांग्रेस की टिकट पर मैदान में उतरे मौलाना असरारुल हक़ कासमी ने सीधे मुकाबले में जदयू के मो असरफ को 80269 मतों से मात दे दी. और पहली बार दिल्ली का सफ़र तय किया. इसके बाद उनके जीत का सिलसिला रुका नहीं और 2014 के चुनाव में जहां पूरा देश मोदी लहर में बह रहा था उस लहर में किशनगंज से रिकॉर्ड मतों से भाजपा उम्मीदवार को हराकर दिल्ली का सफ़र तय किया. इस चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को उन्होंने 194612 मतों से पराजित किया.

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