ठाकुरगंज में आंगनबाड़ी सेविका-सहायिकाओं का फूटा दर्द: 5 महीने से मानदेय बंद, भुखमरी की कगार पर परिवार, दुकानदार भी नहीं दे रहे उधार

Published by : Divyanshu Prashant Updated At : 21 May 2026 11:47 AM

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आंगनबाड़ी केंद्र

किशनगंज जिले के ठाकुरगंज प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न आंगनबाड़ी केंद्रों पर कार्यरत सेविकाओं और सहायिकाओं के सामने इन दिनों गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है. पिछले पांच महीनों से मानदेय (मानदेय राशि) नहीं मिलने के कारण इन जमीनी स्वास्थ्य और पोषण कार्यकर्ताओं के घरों में चूल्हा जलना मुश्किल हो गया है.

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पोषण के बड़े-बड़े दावों के बीच जमीनी कार्यकर्ता खुद बेहाल

एक तरफ जहां सरकार बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य व कुपोषण मुक्ति के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने और बड़े-बड़े दावों के ढोल पीटती है, वहीं इन दावों को धरातल पर उतारने वाली आंगनबाड़ी कर्मियों को खुद भुखमरी की कगार पर छोड़ दिया गया है. ठाकुरगंज प्रखंड की सैकड़ों सेविकाओं और सहायिकाओं ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि लगातार पांच महीने से उनके बैंक खातों में मानदेय की एक भी किश्त नहीं आई है, जिससे उनके सामने रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने की विकट समस्या खड़ी हो गई है.

रिश्तेदारों से कर्ज लेकर चल रहा गुजारा, बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित

पीड़ित आंगनबाड़ी कर्मियों ने बताया कि घर का राशन, बच्चों की स्कूल की फीस, बिजली बिल और बुजुर्गों की दवाइयों के लिए उन्हें स्थानीय दुकानदारों और रिश्तेदारों से लगातार कर्ज लेना पड़ रहा है. लंबे समय से मानदेय बकाया होने के कारण अब स्थानीय दुकानदारों ने भी आगे राशन उधार देना पूरी तरह बंद कर दिया है. नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन पैसों के अभाव में वे अपने बच्चों की कॉपियां, किताबें और यूनिफॉर्म तक नहीं खरीद पा रही हैं, जिससे पूरा परिवार गहरे मानसिक तनाव से गुजर रहा है.

काम का भारी दबाव, पर भुगतान के नाम पर पटना का रोना: संगठन

आंगनबाड़ी कर्मियों का कड़ा आक्रोश इस बात को लेकर है कि बाल विकास परियोजना (ICDS) विभाग द्वारा काम में किसी भी तरह की ढिलाई या कोताही बर्दाश्त नहीं की जाती है. उन्होंने विभाग की दोहरी नीति पर सवाल उठाते हुए कहा:

  • ऑनलाइन एंट्री का दबाव: सुबह केंद्र के सफल संचालन से लेकर ‘पोषण ट्रैकर ऐप’ पर बच्चों की दैनिक हाजिरी और ऑनलाइन डेटा एंट्री का काम समय पर करना अनिवार्य है.
  • सर्वे और बैठकें: हर सप्ताह विभागीय बैठकें, पल्स पोलियो अभियान और अन्य सभी प्रकार के सरकारी सर्वे के काम इन कर्मियों से समय पर पूरे कराए जाते हैं.
  • शो-कॉज की धमकी: यदि किसी तकनीकी खराबी के कारण काम में थोड़ी भी देरी हो जाए, तो बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (CDPO) द्वारा तुरंत स्पष्टीकरण (शो-कॉज) मांग लिया जाता है.

कर्मियों का आरोप है कि जब काम लेने की बारी आती है तो अधिकारी शेर बन जाते हैं, लेकिन जब मानदेय भुगतान की बात आती है, तो स्थानीय अधिकारी सीधे तौर पर पटना (मुख्यालय) से ही आवंटन की कमी होने का रोना रोकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं.

अधिकारियों को सौंपा गया ज्ञापन, बड़े आंदोलन की दी चेतावनी

इस गंभीर समस्या को लेकर आंगनबाड़ी संघ के प्रतिनिधियों द्वारा कई बार स्थानीय स्तर पर बाल विकास परियोजना कार्यालय और संबंधित अधिकारियों को लिखित रूप से अवगत कराया जा चुका है, लेकिन हर बार उन्हें केवल ‘जल्द भुगतान’ का खोखला आश्वासन ही थमा दिया जाता है. आंगनबाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं ने संयुक्त रूप से जिला प्रशासन और बिहार सरकार से मांग की है कि इस कमरतोड़ महंगाई को देखते हुए उनके पिछले 5 महीने के बकाए मानदेय का अविलंब भुगतान सुनिश्चित किया जाए. यदि एक सप्ताह के भीतर मानदेय की राशि उनके खातों में ट्रांसफर नहीं की गई, तो वे सभी मिलकर केंद्र संचालन पूरी तरह ठप कर बाल विकास परियोजना कार्यालय के समक्ष बेमियादी धरना-प्रदर्शन शुरू करने को विवश होंगी.

पौआखाली (किशनगंज) से रणविजय की रिपोर्ट:

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