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छठ महापर्व:शरीर,मन और आत्मा की शुद्धि का अनोखा त्योहार

Updated at : 24 Oct 2025 7:12 PM (IST)
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छठ महापर्व:शरीर,मन और आत्मा की शुद्धि का अनोखा त्योहार

देश की विविध संस्कृति का एक अहम अंग यहां के पर्व हैं.भारत में ऐसे कई पर्व मनाये जातें हैं जो बेहद कठिन माने जाते हैं और इन्हीं पर्वों में से एक है छठ महापर्व.छठ को सिर्फ पर्व नहीं महापर्व कहा जाता है.

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अस्ताचल गामी सूर्य से आशीष लेने का पर्व.

सूर्य अर्घ्य से कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं. सूर्योदय में जल का अर्घ्य देने के कई पर्व हैं,लेकिन अस्ताचल सूर्य को पूजने का यही एक छठ महापर्व है.

किशनगंज.देश की विविध संस्कृति का एक अहम अंग यहां के पर्व हैं.भारत में ऐसे कई पर्व मनाये जातें हैं जो बेहद कठिन माने जाते हैं और इन्हीं पर्वों में से एक है छठ महापर्व.छठ को सिर्फ पर्व नहीं महापर्व कहा जाता है. चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में व्रती को लगभग तीन दिन का व्रत रखना होता है जिसमें से दो दिन तो निर्जला व्रत रखा जाता है. सूर्य को ग्रंथों में प्रत्यक्ष देवता यानी ऐसा भगवान माना है जिसे हम खुद देख सकते हैं.सूर्य ऊर्जा का स्रोत है और इसकी किरणों से विटामिन डी जैसे तत्व शरीर को मिलते हैं.दूसरा,सूर्य मौसम चक्र को चलाने वाला ग्रह है.ज्योतिष के नजरिए से देखा जाए तो सूर्य आत्मा का ग्रह माना गया है.सूर्य पूजा आत्मविश्वास जगाने के लिए की जाती है.पुराणों के नजरिए से देखें तो सूर्य को पंचदेवों में से एक माना गया है,ये पंच देव हैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दुर्गा और सूर्य.किसी भी शुभ काम की शुरुआत में सूर्य की पूजा अनिवार्य रूप से की जाती है.

छठ महापर्व का पौराणिक महत्व

ग्रंथों के जानकार विद्वान बतातें हैं कि मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया है और इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी के रूप में जाना जाता हैछठ व्रत की परंपरा सदियों से चली आ रही है. यह परंपरा कैसे शुरू हुई, इस संदर्भ में कई कथाओं का उल्लेख पुराणों में मिलता है. मान्यताओं के अनुसार सूर्य को अर्घ्य देने से इस जन्म के साथ किसी भी जन्म में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं.अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने से छठ मैया नि:संतान को संतान देती और संतान की रक्षा करती हैं.

सूर्य षष्ठी का व्रत आरोग्य की प्राप्ति, सौभाग्य व संतान के लिए रखा जाता है.

सामाजिक समरसता का है ये त्यौहार

छठ महापर्व खासकर शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का पर्व है.वैदिक मान्यता है कि नहाय-खाय से सप्तमी के पारण तक उन भक्तों पर षष्ठी माता की कृपा बरसती है जो श्रद्धापूर्वक व्रत करते हैं.नहाय-खाय में लौकी की सब्जी और अरवा चावल के सेवन का खास महत्व है.श्रद्धालु बताते हैं कि खरना के प्रसाद का खास महत्व है.तिथियों के बंटवारे के समय सूर्य को सप्तमी तिथि प्रदान की गई.इसलिए उन्हें सप्तमी का स्वामी कहा जाता है. सूर्य अपने प्रिय तिथि पर पूजा से मनोवांछित फल प्रदान करते हैं.

तैयारियों में जुट श्रद्धालु

छठ महापर्वको लेकर हर ओर तैयारियां प्रारंभ हो गई है.पर्व को लेकर गांवों से लेकर शहरी इलाके तक में छठ घाटों को सजाने व संवारने का कार्य तेज हो गया है.वैसे तो इस पर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होती है,लेकिन गांव से लेकर शहरी इलाके में इसकी तैयारियां दीपावली के बाद से ही शुरू हो थी.हरेक घर में पर्व को लेकर गेहूं धोने व सुखाने का कार्य प्रारंभ हो गया है. पर्व को लेकर खरीदारी भी तेज हो गई है.बाजारों में लोगों की भीड़ भी बढ़ती जा रही है.चारों ओर पर्व को लेकर उल्लास चरम पर पहुंच गई है.छठ महापर्व को देखते हुए छठी मईया के गीत भी बजने लगे हैं. इससे वातावरण भी छठमय होने लगा है.सादगी व पवित्रता छठ पूजा की पहचान छठ पूजा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी,पवित्रता,भक्ति एवं आध्यात्म है.इसकी उपासना पद्धति सरल है.इसमें किसी आचार्य की आवश्यकता नहीं है. यह लौकिक रीति-रिवाज एवं ग्रामीण जीवन पर आधारित है.

महाभारत काल से प्रचलित है व्रत

हिंदू धर्म के अधिकांश व्रत-त्योहार महिलाएं ही करती हैं,पर छठ व्रत में पूरा परिवार शामिल हो जाता है. छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल से मानी जाती है.पांडव जब वनवास काट रहे थे,तब द्रौपदी ने कुल पुरोहित की आज्ञा प्राप्त होने पर युधिष्ठिर के साथ छठ व्रत-पूजन किया था. सूर्यदेव ने प्रसन्न होकर युधिष्ठिर को अद्भुत ताम्रपात्र प्रदान किया.इसमें मधुर, स्वादिष्ट भोजन हमेशा उपलब्ध रहता था द्रौपदी के व्रत-पूजन से प्रसन्न होकर सूर्य भगवान (छठ माता) ने युधिष्ठिर को राज-पाट, धन-दौलत, वैभव, मान-सम्मान, यश, कीर्ति पुन: प्रदान किया.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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AWADHESH KUMAR

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AWADHESH KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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