ईद-उल-अजहा की नमाज ईदगाह में अदा करना सुन्नते मौकेदा है : नजमुल हसन

Published at :13 Sep 2016 6:46 AM (IST)
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ईद-उल-अजहा की नमाज ईदगाह में अदा करना सुन्नते मौकेदा है : नजमुल हसन

किशनगंज : ईद उल अजहा अर्थात कुरबानी इब्राहिम अलिहे सलाम की यादगार है, जिसे सालाना यादगार के तौर पर मनाया जाता है़ उक्त बातें इंजीनियर नजमूल हसन साकिब ने कही. उन्होंने बताया कि कुरबानी के दिन में कुरबानी से ज्यादा अल्लाह की निगाह में कोई महबूब नही. इसलिए कुरबानी दिल की खुशी और पूरी रगबत […]

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किशनगंज : ईद उल अजहा अर्थात कुरबानी इब्राहिम अलिहे सलाम की यादगार है, जिसे सालाना यादगार के तौर पर मनाया जाता है़ उक्त बातें इंजीनियर नजमूल हसन साकिब ने कही. उन्होंने बताया कि कुरबानी के दिन में कुरबानी से ज्यादा अल्लाह की निगाह में कोई महबूब नही. इसलिए कुरबानी दिल की खुशी और पूरी रगबत के साथ किया जाना चाहिए़ आकिल, बालिक, व मोकिम मुसलमान पर कुरबानी वाजिब है जिसकी मिलकियत में 52.5 तौला चांदी या उसकी कीमत का माल, जेवरात, जायदाद और घर मकान वैगरह इंसानी जिदंगी की बुनियादी जरुरतों से ज्यादा मौजूद हो़ आगे बताते हैं

अल्लाह के रसूल सललाहो अलिहे ओसलम का इरशाद है कि अल्लाह की इबादत के लिए जिलहज्जा के पहला असरा से बेहतर कोई जमाना नहीं इनमें एक दिन का रोजा एक साल के रोजो के बराबर होता है और एक रात की इबादत शबेकद्र की इबादत के बराबर होता है़ जिलहज्जा के नौवीं तारीख का दिन व उसके बाद वाली रात दोनों अपने अंदर बड़े फजिलत व अहमियत रखते हैं.

उन्होंने बताया कि ईद उल अजहा के दिन सबेरे जग कर नित्य क्रिया से निवृत होकर अपनी हैसियत के अनुसार उमदा पौशाक पहनकर, खश्बू लगा कर ईद्गाह जाना व तब तक भूखे रहना, एक रास्ता से जाना व दूसरा रास्ता से वापस आना फरमाया गया है़ ईद उल अजहा की नमाज ईद्गाह में अदा करना सुन्नते मौकेदा है छूट जाने पर गुनेहगार माना जाएगा अलबा बारिस वैगरह की मजबूरी से शहर की मस्जिदों में नमाजे ईद की इजाजत है़ हज के बारे पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि हज वही शक्स कर सकता है जिसके पास अपना पाक साफ पैसा हो साथ ही साथ हज के दौरान होनेवाले खर्च व घर वापसी तक परिवार के पास सारा सामान मौजूद हो़ हज का जमाना एक सौवाल से दस जिलहज्जा तक है, जो इस आयाम में अपने उपर हज मुकर्रर कर ले हज का एहराम बांध ले तो फिर न उसे कोई बुरी बात या गुनाह आदि जायज है और न उदले हुक्म दुरुस्त है और न ही किसी प्रकार के झगड़ा आदि जायज है अर्थात सभी प्रकार के बुराईयों को त्याग कर नेकी करता है़ हज के दौरान जो इन बातों का ख्याल रखता है तो उधर से लौटते समय ऐसा एहसास करता है कि वह अभी अभी मां के गर्भ से धरती पर अभी अभी आया है़ जो मानव तीन हज करता है तो पहला हज अपना फर्ज अदा करता है दूसरा अल्लाह पर कर्ज देता है किंतु जो तीसरा भी सभी नियमों के ताकीद के साथ पूरा करता है तो अल्लाह जिन्नेह सानोह उसकी खाल व बाल को आग पर हराम कर देता है़ वहीं आगे बताते हैं कि हज से तो जाति गुनाह की माफी तो हो जाती है लेकिन हूकूक गुनाह की माफी नहीं होती़

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