धीमी पड़ गयी चाक की रफ्तार

धीमी पड़ गयी चाक की रफ्तार फोटो है 2 में कैप्सन- चाक पर बरतन गढ़ता कुम्हार लागत अधिक व आमदनी कम होने के कारण विलुप्त हो रहा यह व्यवसाय युवा वर्ग नहीं ले रहे इस व्यवसाय में दिलचस्पी, प्लास्टिक से बने सामान फैला रहे प्रदूषणप्रतिनिधि, खगड़ियाबदलते युग के साथ चाक की रफ्तार धीमी पड़ गयी […]
धीमी पड़ गयी चाक की रफ्तार फोटो है 2 में कैप्सन- चाक पर बरतन गढ़ता कुम्हार लागत अधिक व आमदनी कम होने के कारण विलुप्त हो रहा यह व्यवसाय युवा वर्ग नहीं ले रहे इस व्यवसाय में दिलचस्पी, प्लास्टिक से बने सामान फैला रहे प्रदूषणप्रतिनिधि, खगड़ियाबदलते युग के साथ चाक की रफ्तार धीमी पड़ गयी है. कभी कुम्हार जाति के लोगों का मुख्य व्यवसाय माना जाने वाला यह कार्य आज विलुप्त होने के कगार पर है. मिट्टी से एक से बढ़ कर सामान/बरतन गढ़ने वाला यह वर्ग आज पलायन करने या फिर दूसरा व्यवसाय करने को मजबूर है. सालों साल होने वाला यह व्यवसाय आज चंद दिनों का मेला बन कर रह गया है. आधुनिकता के इस दौर में मिट्टी से बने बरतन की जगह आज धातु, प्लास्टिक व कागज से बने सामान ले लिये हैं. चाक पर बनने वाले ग्लास, दीप तक आज प्लास्टिक, लोहा, पीतल से बने बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं. इसके कारण मिट्टी से बने सामान की उपयोगिता आज लगभग खत्म हो गयी है. वर्षों पूर्व मिट्टी से बने बरतन का उपयोग ही प्रमुख था.प्लास्टिक व कागज का उपयोग समय बदलने के साथ साथ धातु से बने बर्तन/ सामान का व्यवसाय भी धीमा पड़ गया और उसकी जगह प्लास्टिक तथा कागज से बने दैनिक उपयोग में आने वाले सामान ने ले लिया. आज प्लास्टिक से बने कप, प्लेट, थाली , ग्लास आदि का कारोबार काफी फल फूल रहा है. इस कारण धातु से बने कुछ सामान की बिक्री में भी गिरावट आयी. स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से महत्व भले ही आज आधुनिकीकरण के कारण मिट्टी से बने सामान का उपयोग कम हो गया हो, लेकिन आज भी स्वास्थ्य के प्रति सजग हरने वाले व्यक्ति प्लास्टिक से बने सामान को उपयोग में लाने से परहेज करते हैं. प्लास्टिक से बनने वाले सामान को बनाने में केमिकल का उपयोग होता है, जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से नुकसानदेह माना जाता है. प्लास्टिक के बरतन में गरम पेय पदार्थ जैसे चाय, कॉफी , दूध, पानी आदि का सेवन तो स्वास्थ्य के लिए काफी खतरनाक है. ऐसी चीज के सेवन के लिए मिट्टी का वर्तन बेहतर माना गया है. कहते हैं कारीगरमिट्टी के बरतन बनाने वाले कुम्हार बहादुर पंडित, किरण पंडित आदि ने बताया कि इस महंगाई में अब मिट्टी के बरतन गढ़ कर परिवार का भरण पोषण कर पाना मुश्किल हो गया है. इस कारण पूजा पाठ के समय ही इसका थोड़ा बहुत कारोबार करते हैं. इसके बाद ये लोग खेती बारी या फिर अन्य कार्य करते हैं. धातु से बने सामान के कारण मिट्टी से सामान का व्यवसाय काफी प्रभावित हुआ है. मिट्टी का बरतन बनाने में मेहनत ज्यादा और आमदनी कम होती है. इस कारण युवा वर्ग भी इस व्यवसाय में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं. जिस कारण यह व्यवसाय धीरे धीरे विलुप्त होने के कगार पर है.
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