सार्वजनिक बुढ़िया काली मंदिर की महिमा है अपरंपार

सार्वजनिक बुढ़िया काली मंदिर की महिमा है अपरंपार
कदवा प्रखंड के कुम्हड़ी में स्थित सार्वजनिक बुढ़िया काली मंदिर की महिमा अपरम्पार है. अमावस्या की रात को मां काली की मूर्ति को ग्रामीणों तथा श्रद्धालुओं द्वारा कंधे पर उठाकर लगभग एक किलोमीटर तक मंदिर में ले जाकर स्थापित करने का दृश्य भी निराली होती है. सैकड़ों लोगों के साथ मशाल जुलूस व ढोल नगाड़े के साथ मां को मंदिर में स्थापित किया जाता है. प्रतिमा ले जाने के समय सड़क के दोनों ओर सभी घरों के दरवाजे खोल दिये जाते है. सभी लोग अपने- अपने घरों के सामने दीप तथा अगरबत्ती जलाकर श्रद्धा भाव से हाथ जोड़ कर खड़े रहते है. माता के गुजरने वाले रास्ते को साफ सुथरा कर आकर्षक ढंग से सजाया जाता है. काली मंदिर के अध्यक्ष श्रीनारायण सिंह उर्फ हप्पू सिंह ने बताया कि पूजा की रात्रि से लेकर दूसरे दिन तक सैकड़ों छागर की बलि दी जाती है. छागर चढ़ाने वालो को लंबा इंतजार करना पड़ता है. सार्वजनिक बुढ़िया काली मंदिर की दूर-दूर तक ख्याति फैली हुई है. लगभग सौ वर्षो से भी पुरानी इस मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं का अटूट आस्था है. एक वर्ष से भी अधिक समय से लोगों के सहयोग से लगभग 80 लाख से भी अधिक की लागत से इस भव्य मंदिर का निर्माण बंगाल के कारीगरों द्वारा कराया जा रहा है. कटिहार सहित कई अन्य जिला के लोग भी माता की पूजा अर्चना करने तथा आशीर्वाद लेने मंदिर पहुंचते है. इस संबंध में मंदिर के पुरोहित अखिलेश झा ने बताया कि मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है.काली पूजा के मौके पर बाहर काम कर रहे इस गांव के सभी लोगों का घर आना जरूरी होता है. कुम्हड़ी काली पूजा को लेकर लोगों में उत्साह का माहौल व्याप्त रहता है.
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