माहवारी स्वच्छता दिवस आज: पीरियड्स को समाज को बदलनी पड़ेगी पारंपरिक सोच

Published by : RAJKISHOR K Updated At : 27 May 2026 6:32 PM

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माहवारी स्वच्छता दिवस आज: पीरियड्स को समाज को बदलनी पड़ेगी पारंपरिक सोच

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कटिहार भारत में भले ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो. मुख्यधारा व सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े विषयों पर बहस हो. पर पीरियड्स पर लोग आज भी खुलकर बात करने से कतराते है. भारत जैसे प्रगतिशील देश मे आज भी पीरियड्स पर बात नहीं होती है. साथ ही यहां पीरियड्स को लेकर अजीब तरह की धारणाएं भी है. कई जगहों पर स्थिति ऐसी है कि महीने के पीरियड्स वाला दिन महिलाओं के लिए नरक की तरह होता है. कई संस्थाएं व लोग इस दिशा में काम कर रहे है. जिससे महिलाओं के जीवन से जुड़े इस सबसे अहम हिस्से को आसान एवं परेशानी से मुक्त बनाया जा सके. गुरुवार को महावारी स्वच्छता दिवस है. ऐसे में कई संगठनों की ओर से इस दिवस पर महामारी को लेकर व्याप्त भ्रांतियां को दूर कर इसे स्वच्छता के रूप में मनाने को लेकर गतिविधियां आयोजित करने की तैयारी की गयी है. माहवारी से जुड़ी वर्जनाओं को तोड़कर किशोरियों व महिलाओं को इसके प्रति जागरूक करने की जरूरत है. जानकारों की मानें तो अभी भी सुदूर ग्रामीण इलाके में महिलाए व लड़कियां माहवारी के दौरान साफ कपड़ा इस्तेमाल नहीं करने से बीमार पड़ती है. कई बार तो जान से भी हाथ धोना पड़ता है. कई मामले में गर्भाशय तक खराब हो जाती है. पीरियड्स को लेकर बदलनी होगी मानसिकता दरअसल मासिक धर्म यानी माहवारी महिलाओं की जीवनचर्या का अभिन्न अंग है. इसलिए जरूरी है कि इसपर खुल कर बात हो. माहवारी स्वच्छता दिवस की शुरुआत करने के पीछे भी यही उद्देश्य रहा है कि इस बारे में खुल कर बात करें. ताकि यह विषय दुनिया के लिए अस्पृश्य न रह कर सामान्य ज्ञान की श्रेणी में आ सके. जानकारों की मानें तो सरकारों और संस्थाओं ने माहवारी संबंधी जागरूकता लाने के उद्देश्य से विभिन्न योजनाएं शुरू की. पर अब भी समाज का हर क्षेत्र इस जागरूकता से कोसों दूर है. यह भी सच है कि अभी भी बड़ी संख्या में लोग माहवारी को समाज में अस्पृश्य विषय मान कर इस पर बात करने से डरते है. महामारी को लेकर लोगों के मन में व्याप्त डर को तभी दूर किया जा सकता है. जब लैंगिक भेद भेदभाव समाप्त होगी. लैंगिक भेदभाव भी एक बड़ा कारण है कि महामारी को हम अस्पृश्यता के दृष्टिकोण से देखते है. ग्रामीण क्षेत्र के कुछ महिलाओं ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि मासिक धर्म के दौरान अभी भी हम लोग पूजा पाठ नहीं करते है. साथ ही पीरियड के दौरान कई कामों से परहेज करते है. घर परिवार में भी लोग इस अवधि में दूरी बनाकर रहते है. ऐसे हुई माहवारी दिवस की शुरुआत दरअसल वैश्विक स्तर पर हर साल 28 मई को मासिक धर्म स्वच्छता दिवस मनाया जाता है. जानकारों की मानें तो वर्ष 2014 में में जर्मन के ””वॉश यूनाइटेड”” नामक एक संस्था ने इस दिन को मनाने की शुरुआत की थी. इस दिवस मुख्य उद्देश्य लड़कियों और महिलाओं को महीने के उन चार-पांच दिन यानी मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता रखने के लिए जागरूक किया जाय. तारीख भी 28 चुना गया. इसकी वजह है कि आमतौर पर महिलाओं के मासिक धर्म 28 दिनों के भीतर आते हैं और पीरियड्स साइकल 28 दिनों का होता है. कहती है महिला अधिकार कार्यकर्ता महिला अधिकार कार्यकर्ता रश्मि प्रिया ने प्रभात खबर के साथ बातचीत में कहा कि वह पिछले कई वर्षों तक ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं के बीच महावारी स्वच्छता अभियान के दौरान महिलाओं व लड़कियों को पीरियड के समय स्वच्छ रहने के प्रति जागरूक किए है. लेकिन अभी भी अधिकांश महिलाएं और लड़कियां रूढ़िवादी सोच व सामाजिक ताना-बाना के बीच फंसी हुई है. जब तक लैंगिक भेदभाव दूर नहीं होगा तथा पारंपरिक सोच में बदलाव नहीं होगा. तब तक महिलाएं पीरियड के दौरान स्वच्छता हासिल नहीं कर सकेगी इसलिए महिलाओं को भी अब इस मुद्दे पर चुप्पी तोड़ना चाहिए.

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