ग्रामीण महिलाओं ने नहीं छोड़ा देसी सवइयों का स्वाद

Published by :RAJKISHOR K
Published at :22 Mar 2025 7:01 PM (IST)
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ग्रामीण महिलाओं ने नहीं छोड़ा देसी सवइयों का स्वाद

ग्रामीण महिलाओं ने नहीं छोड़ा देसी सवइयों का स्वाद

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हाथ से बनाये सेवई में स्वाद भी बेहतर और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद भी कोढ़ा रमजान अपने अंतिम चरण में है और ईद की तैयारियां पूरे जोरों पर हैं. मुस्लिम बाहुल्य गांवों में आज भी पारंपरिक रीति-रिवाजों को जीवंत रखा जा रहा है. बाजार में मशीन से बनी सेवइयों की भरमार के बावजूद, ग्रामीण मुस्लिम महिलाएं अपने हाथों से देसी सेवइयां बनाने में जुटी हैं. पहले के समय में यह परंपरा थी कि रमजान शुरू होते ही गांवों की महिलाएं इकट्ठा होकर गेहूं, मैदा और सूजी से हाथ से बनी सेवइयां तैयार करती थीं. आधुनिकता और बाजारवाद ने इस परंपरा को काफी हद तक प्रभावित किया है, फिर भी कुछ महिलाएं इसे जिंदा रखने का प्रयास कर रही हैं. ग्रामीण महिलाओं के अनुसार, वे पहले आटे और मैदा को अच्छी तरह गूंथकर पतली-पतली सेवइयां तैयार करती हैं. इन्हें धूप में सुखाया जाता है और शुद्ध घी में हल्का भूनकर इसका खास स्वाद दिया जाता है. मानना है हाथ से बनी सेवइयों का स्वाद बाजारू सेवइयों से कई गुना बेहतर होता है. एक ग्रामीण महिला सायरा बेगम बताती हैं, हम हर साल रमजान में खुद सेवइयां बनाते हैं. यह हमारे परिवार की परंपरा रही है और हम इसे आगे भी जारी रखेंगे. बाजार की सेवइयां देखने में तो सुंदर होती हैं, उनमें घर की बनी सेवइयों का स्वाद नहीं होता. बाजार में मिलने वाली सेवइयों ने पारंपरिक सेवइयों की जगह लेना शुरू कर दिया है, फिर भी कई मुस्लिम परिवार अपनी परंपराओं को बनाए रखने के लिए अपने घरों में ही सेवइयां तैयार कर रहे हैं. उनका मानना है कि यह न सिर्फ स्वाद में बेहतर होती हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद हैं. बाजारों में सेवइयों की बढ़ती मांग दूसरी ओर, बाजारों में लच्छा सेवइयों की दुकानें भी सज गयी हैं. तरह-तरह की मशीन से बनी सेवइयां ग्राहकों को लुभा रही हैं. कटिहार जिले के कई बाजारों और चौक-चौराहों पर सेवइयों की बिक्री जोरों पर है. दुकानदारों के अनुसार, ईद करीब आते ही सेवइयों की मांग में जबरदस्त बढ़ोतरी हो जाती है. दुकानदार अजीम खान बताते हैं, लोगों की पसंद बदल रही है, पहले हर घर में महिलाएं सेवइयां बनाती थीं, लेकिन अब बाजार की सेवइयां ज्यादा खरीदी जा रही हैं. फिर भी कुछ परिवार आज भी पारंपरिक सेवइयां पसंद करते हैं. ।

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