रोजा इस्लाम का एक अहम स्तंभ, हाफिज अख्तर मिस्बाही

Published at :02 Mar 2025 7:01 PM (IST)
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रोजा इस्लाम का एक अहम स्तंभ, हाफिज अख्तर मिस्बाही

रोजा इस्लाम का एक अहम स्तंभ, हाफिज अख्तर मिस्बाही

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आबादपुर रोजा इस्लाम के बताये गये पांच अरकानों में से एक अहम स्तम्भ है. इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार माह ए रमजान के दौरान पैगम्बर मुहम्मद साहब को पाक परवर दिगार से कुरान की आयतें प्राप्त हुयी थी. तभी से यह महीना बेहद ही पाक व मुकद्दस माना जाने लगा. रोजा इस पाक मुकद्दस महीने में खुदा की इबादत के लिए ही रखे जाते हैं. माह-ए-रमजान का पहला अशरा रहमतों से भरा होता है. इस दरमियान अदा की गयी हर एक नफ्ल नमाजों का सवाब फर्ज नमाजों के बराबर होता है. फर्ज नमाजों का सवाब 70 गुना ज्यादा होता है. लिहाजा मोमिनों को चाहिए कि इस पाक महीने के दरमियान नमाजों को पूरी-पूरी शिद्दत के साथ अदा किया करें. उक्त बातें बारसोई प्रखंड के आबादपुर पंचायत स्थित मदारगाछी निवासी हाफिज अख्तर मिस्बाही ने रविवार को पहले रोजे के दौरान मोमिनों को रमजान की फजिलते बताते हुए हुए कही. उन्होंने कहा कि रोजा केवल भूखे रहने की ही सूरत नहीं है. बताये गये इबादतों को भी अमल में लाना निहायत ही जरूरी है. इन दिनों तकवा किया जाता है. यहां तकवा का अर्थ है अल्लाह-ता-आला के पसंदीदा कार्यों को करना. उन्होंने बताया कि रमज़ान के दौरान रखी जाने वाली रोजों की बड़ी फजिलतें हैं. पूरी शिद्दत के साथ रखीं जाने वाली रोजों से परवर दिगार खुश होते हैं और इसका सवाब वे खुद देते हैं. हाफिज ने अकीदतमंदों से इस पाक माह के दौरान पूरे खुलूस के साथ कुरान-ए-पाक की तिलावत करने की बात कही. उन्होंने बताया कि रमजान त्याग का महीना है. मोमिनों से गरीबों, मिस्कीनों व जरूरतमंदों के बीच बराबर-बराबर सदका-खैरात व जकात बांटने की बात कही. हाफिज ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी रोजेदार को इफ्तार कराता है तो अल्लाह इसके एवज में उसके सारे गुनाह माफ कर देते हैं.

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