प्रशासनिक व राजनीतिक उपेक्षा का दंश झेल रहा है सांस्कृतिक व ऐतिहासिक धरोहर

Published by :RAJKISHOR K
Published at :17 Apr 2025 7:03 PM (IST)
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प्रशासनिक व राजनीतिक उपेक्षा का दंश झेल रहा है सांस्कृतिक व ऐतिहासिक धरोहर

प्रशासनिक व राजनीतिक उपेक्षा का दंश झेल रहा है सांस्कृतिक व ऐतिहासिक धरोहर

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प्रभात खास- विश्व धरोहर दिवस आज कटिहार शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में कई ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व के रूप में धरोहर है. वर्षों से ऐसे धरोहर प्रशासनिक व राजनीतिक इच्छाशक्ति की उपेक्षा का शिकार रहा है. हालांकि पिछले कुछ महीनों से ऐसे सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व के धरोहर को विकसित करने के उद्देश्य कई तरह की प्रक्रिया शुरू हुई है. पर अब तक उसका परिणाम सामने नहीं आया है. शुक्रवार को विश्व धरोहर दिवस है. यद्यपि कटिहार जिले में विश्वस्तरीय धरोहर के मानक के अनुरूप कोई धरोहर फिलहाल नहीं है. पर अगर जिले के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व के धरोहरों का असेसमेंट कराया जाय तो कुछ धरोहर विश्वस्तरीय मानक के अनुरूप आ सकती है. मसलन, कुरसेला के प्रसिद्ध गांधी घर, बरारी के लक्ष्मीपुर, कांतनगर और भवानीपुर गुरुद्वारा, बारसोई के लतिफिया रहमानपुर तकिया शरीफ, आजमनगर के जलकी मजार, गोरखनाथ धाम मंदिर, मनिहारी का पीर मजार व गोगाबिल झील आदि ऐसे ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व के धरोहर है. जिस की विशिष्टता जगजाहिर है. जिले के ऐसे ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहर को अक्षुण्ण बनाये रखने तथा ऐसे स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के निर्देश पर जिला प्रशासन की ओर से प्रक्रिया चलायी जा रही है. पर अब तक इसका परिणाम सामने नहीं आया है. शुक्रवारको होने वाले विश्व धरोहर दिवस के परिप्रेक्ष में जिले के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व के धरोहर पर प्रभात खबर ने पड़ताल की है. प्रस्तुत है जिले के कुछ ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व पर पड़ताल करती है रिपोर्ट. कुरसेला का गांधीघर व गंगा-कोसी संगम स्थल जिले के कुरसेला प्रखंड में स्थित गांधी घर का ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व है. हर वर्ष गांधी जी के शहादत दिवस से लेकर तेरहवीं होने तक यहां मेला जैसा नजारा रहता है. देश भर से गांधीवादी यहां जुटते है. बताया जाता है कि सन् 1934 के भूकंप के दौरान महात्मा गांधी भूकंप के पीडि़तों की सहायता के लिए कुरसेला आये थे. गांधी जी की स्मृतियों को जीवंत रखने के लिए ही यहां सर्वोदय आश्रम गांधी घर बनाया गया है. गांधी घर के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए राज्य सरकार ने इसे गांधी सर्किट से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की है. कुछ वर्ष पूर्व गांधी स्मृति दर्शन समिति ने इसे गांधी इंटरप्रिटेशन सेंटर के रूप में विकसित करने की स्वीकृति भी दी है. गांधी सर्किट से जुडऩे के बाद देश भर में गांधी घर की पहचान में बढ़ोतरी होगी. इसी प्रखंड में गंगा व कोसी का संगम स्थल है. इस संगम स्थल का ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व है. इस संगम स्थल पर हर वर्ष श्रद्धालुओं व देश के सामाजिक कार्यकर्ता भी यहां पहुंचते है. पर अब तक जिस स्तर पर इस संगम स्थल का विकास होना चाहिए. वैसा विकास नहीं हुआ है. अभी हाल ही में सरकार ने पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए करीब तीन करो रुपये के प्रस्ताव को मंजूरी दी है. बरारी का ऐतिहासिक गुरुद्वारा गुरुतेग बहादुर एतिहासिक गुरुद्वारा लक्ष्मीपुर सिखों के नवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर की याद में यह गुरुद्वारा स्थापित है. सन 1666 में गुरु जी यहां के कांतनगर में पधारे थे. इस गुरुद्वारे में गुरुजी से जुड़ी कई अनमोल धरोहर आज भी सुरक्षित है. लक्ष्मीपुर सिख बाहुल्य गांव है. यहां प्रत्येक वर्ष गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस मनाया जाता है. इसके आसपास कांत नगर व भवानीपुर में भी प्रसिद्ध गुरुद्वारा है. कांत नगर के गुरुद्वारा को गुरु तेग बहादुर गुरुद्वारा कहा जाता है. जबकि भवानीपुर के गुरुद्वारा को ऐतिहासिक गुरुद्वारा का नाम दिया गया है. कांति नगर के गुरुद्वारा में हर वर्ष प्रकाश पर्व मनाया जाता है. इन गुरुद्वारा को सिख सर्किट से जोड़ने की प्रक्रिया भी चल रही है. देश- विदेश से भी यहां सिख समुदाय के लोग पहुंचते है. राज्य सरकार की ओर से भी इन गुरुद्वारा को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव लेने की प्रक्रिया चल रही है. इन गुरुद्वारा में हस्तलिखित ग्रंथ भी गुरुदेव की है. मनिहारी के गोगा बिल झील व पीर मजार जिले के मनिहारी अनुमंडल अंतर्गत प्रसिद्ध गोगा बिल झील पक्षी विहार के रूप में प्रसिद्ध है. यह गोगा बिल करीब 200 एकड़ के भूभाग तक फैला हुआ है. अभी हाल ही मुख्यमंत्री ने अपनी प्रगति यात्रा के दौरान इस झील का हवाई सर्वे करते हुए इसे विकसित करने के राशि आवंटित की है. पर जितनी राशि आवंटित की है. वह पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए काफी जम है. उल्लेखनीय है कि हर वर्ष इस गोगा बिल झील में विदेशी पक्षी प्रवास के लिए पहुंचते है. साइबेरियन व अन्य देशों के करीब 300 प्रजाति से अधिक की पक्षी यहां प्रवास करते है. फरवरी- मार्च के महीने में ऐसे प्रवासी पक्षी अपने वतन को लौट जाते है. मनिहारी प्रखंड में पीर मजार रेलवे स्टेशन के समीप है. इसके समग्र विकास को लेकर भी अब तक कोई पहल नहीं हुई है. पीर मजार में भी हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग दर्शन करने पहुंचते है. इस प्रखंड में कई ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व के अन्य स्थल भी है. पर उपेक्षा के शिकार है. आजमनगर का गोरखनाथ धाम मंदिर व जलकी पीर मजार जिले के आजमनगर प्रखंड अंतर्गत गोरखनाथ धाम मंदिर में दूधिया रंग का शिवलिंग है. इस प्रसिद्ध गोरखनाथ धाम मंदिर में सावन के महीने में लाखों श्रद्धालु जलाभिषेक करने पहुंचते है. मनिहारी के गंगा नदी से जल भरकर पैदल व विभिन्न माध्यमों से श्रद्धालु गोरखधाम मंदिर पहुंचते है तथा जलाभिषेक करते है. पर अब तक बैजनाथ धाम मंदिर की तर्ज पर इस मंदिर का विकास नहीं किया जा सका है. अभी हाल ही में प्रगति यात्रा के दौरान कटिहार पहुंचे मुख्यमंत्री ने इस मंदिर के सौंदर्यीकरण विकास के लिए राशि आवंटित की है. इसी प्रखंड में जलकी में स्थित पीर मजार भी काफी प्रसिद्ध है. अभी हाल ही में यहां के उर्स में दूर-दूर से लोग पहुंचे थे. गोरखनाथ धाम मंदिर और जलकी पीर मजार को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है. पर अब तक जमीन पर अमल होता नहीं दिख रहा है. बारसोई के खानकाह लतिफिया तकिया शरीफ ————————————————– बारसोई में खानकाह लतिफिया तकिया शरीफ प्रसिद्ध पीर मजार है. यहां भी हर वर्ष बड़ी संख्या में दूर दराज से अकीदतमंद पहुंचते है. चादरपोशी व अन्य कई तरह के कार्यक्रम किये जाते है. वर्षों से इस स्थल को पर्यटन के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया चल रही है. पर अब तक वह आकार रूप नहीं ले सका है. इसी प्रखंड में बेलवा में स्थित सरस्वती मंदिर भी है. जिसका सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व ऐतिहासिक महत्व है. हालांकि सरकार के निर्देश पर जिला प्रशासन ने इन सांस्कृतिक व ऐतिहासिक स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के उद्देश्य से प्रक्रिया शुरू की है. अब कब तक स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जायेगा. यह आने वाला समय ही बतायेगा. शहर का शहीद चौक व शहीद स्मारक शहर के हृदयस्थली शहीद चौक को कहा जाता है. इसके समीप ही टाउन हॉल के सामने शहीद स्मारक भी बना हुआ है. स्वाधीनता संग्राम का यह जीता जागता साक्षी है. बताया जाता है कि शहीद चौक पर ही 13 अगस्त 1942 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर आजादी के दीवानों ने सड़क पर उतरा था. जिसमें ध्रुव कुंडू नामक छात्र सहित कई स्वाधीनता संग्राम के वीर सपूतों को गोली लगी थी. बाद में कुछ वीर सपूत शहीद हो गये. उनकी स्मृति में शहीद चौक नाम दिया गया. जिन लोगों ने आजादी के संघर्ष में शहादत दिया. उनके नाम से शहीद स्मारक बनाया गया. पर शहीद चौक व शहीद स्मारक जिस स्तर पर विकास होना चाहिए. उस तरह का विकास नहीं हुआ है. कुछ वर्ष पूर्व शहीद चौक पर बापू के प्रतिमा के सौंदर्यीकरण करते हुए सर्वधर्म टावर का निर्माण कराया गया. पर अब भी शहीद चौक व शहीद स्मारक अपेक्षित विकास से महरूम है.

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