न्यायिक पदाधिकारियों व वकीलों में हुई नोकझोंक

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कटिहार : गुरुवार को व्यवहार न्यायालय के एसडीजेएम के न्यायालय में न्यायिक पदाधिकारी व वकील के बीच हुई अशोभनीय घटना ने न्याय के प्रति माने जाने वाले न्यायालय को तार-तार कर दिया. संभवत: व्यवहार न्यायालय में न्यायिक कार्रवाई के दौरान प्रथम बार ऐसी अशोभनीय हरकत दोनों पक्षों की ओर से देखने को मिली. इस मामले […]

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कटिहार : गुरुवार को व्यवहार न्यायालय के एसडीजेएम के न्यायालय में न्यायिक पदाधिकारी व वकील के बीच हुई अशोभनीय घटना ने न्याय के प्रति माने जाने वाले न्यायालय को तार-तार कर दिया.
संभवत: व्यवहार न्यायालय में न्यायिक कार्रवाई के दौरान प्रथम बार ऐसी अशोभनीय हरकत दोनों पक्षों की ओर से देखने को मिली. इस मामले में अधिवक्ता संघ ने एक ओर कड़ा रुख लेते हुए शुक्रवार को आपात बैठक कर अधिवक्ता विश्वनाथ प्रमाणिक को संघ से निलंबित कर दिया. अधिवक्ता संघ के सचिव विजय कुमार झा ने बताया कि संघ की ओर से अनुमंडल न्यायिक पदाधिकारी द्वारा न्यायालय के चलने के दौरान किये गये अपशब्दों के प्रयोग के बाबत सही तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी बना दिया गया है. जिसके रिपोर्ट आने पर उच्च न्यायालय प्रशासन को इसकी सूचना दी जायेगी. वहीं न्यायालय प्रशासन ने भी इस मामले में अपने पदाधिकारी को स्वच्छ दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ने की कवायद कर रहा है.
क्या हुई थी घटना
गुरुवार को एसडीजेएम के न्यायालय में कार्रवाई के दौरान अधिवक्ता विश्वनाथ प्रमाणिक ने किसी अभिलेख के नहीं मिलने तथा उसे कर्मचारियों पर जान-बूझ कर प्रस्तुत नहीं करने का आरोप लगा रहे थे. इसी दौरान कुछ अपशब्दों का प्रयोग उनके द्वारा करने पर न्यायिक पदाधिकारी भी आपा खो बैठे और देखते ही देखते दोनों ओर से ऐसी हरकतें और गाली-गलौज होने लगे, जो अपनी मर्यादा को लांघते हुए मारपीट पर उतारू हो गये. फलस्वरूप यह खबर धीरे-धीरे आग की तरह पूरे न्यायालय में फैल गयी. जिसे अब भी कम होने की संभावना नहीं है.
अभिलेखों का नहीं मिलना आम बात
पिछले वर्ष न्यायिक पदाधिकारियों का लगातार पदोन्नति और जिले में स्थित थाने के अनुसार वादों का अलग-अलग न्यायालयों में बंटवारा होना अभिलेखों के नहीं मिलने का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है. चूंकि गुरुवार की घटना ने अभिलेख नहीं मिलने के कारण ही उत्पन्न हुई थी. सच्चाई यह है कि आज भी सैकड़ों आपराधिक अभिलेखों का नहीं मिलना एक रहस्य बना हुआ है. अभिलेखों में पड़ने वाले तारीखों की जानकारी का ना तो पक्षकार को पता है ना ही वकीलों को. सामान्य रूप से प्राय: अधिवक्ताओं के दो-चार अभिलेखों की तारीख उनकी डायरी से गायब है.
किन-किन न्यायिक दंडाधिकारियों के अभिलेख अब भी असामान्य: पूर्व के न्यायिक दंडाधिकारी सुनील कुमार, श्रीराम झा, आरके मिश्र, बीके राय पदोन्नति प्राप्त कर अलग-अलग न्यायालय में पदस्थापित हो गये लेकिन इनके न्यायालयों में पदस्थापित कर्मचारी भी जुगाड़ लगा कर अलग-अलग न्यायालय में चले गये. जबकि अभिलेख न्यायालय के किस कार्यालय में रखा है, ये सामान्य अधिवक्ताओं या पक्षकारों को इसकी जानकारी नहीं है. फलस्वरूप ऐसे अभिलेखों को जब संबंधित थानों के देखने वाले न्यायालयों में भेजा जा रहा है तो पदाधिकारी उसे अनुपस्थित बता कर उनके बेल बांड को रद कर रहे हैं. ऐसे में पक्षकारों में अधिवक्ताओं के प्रति विश्वास कम होता जा रहा है. जो कि गुरुवार की घटना का एक मुख्य कारण भी माना जा रहा है.
नाजायज लोगों के सहारे चल रहा है न्यायालय का कार्यालय : सामान्य रूप से न्यायिक पदाधिकारियों के न्यायालयों में स्थायी कर्मचारियों की उपस्थिति देखने को मिलती है, लेकिन उनके कार्यालयों की स्थिति ये है कि नाजायज लोग भी उनके कार्यालयों में अभिलेखों का संधारण से लेकर प्लेसिंग का कार्य करते हैं. कई मामले में तो ऐसा देखा जा रहा है कि न्यायालय के तिथियों में संबंधित पेशकारों द्वारा आदेश पत्र नहीं लिख कर उसी नाजायज लोगों के द्वारा अंतिम समय में लिखने का कार्य किया जाता है. ऐसी स्थिति में कई बार आदेश पत्र अपरिपक्व अथवा एक ही ढर्रे में लिखा जा रहा है. जिसका नकारात्मक प्रभाव अधिवक्ताओं के प्रति पक्षकारों में देखा जाता है. जबकि अधिवक्ता वर्ग ऐसे कार्यों से अनभिज्ञ होते हैं.
कहते हैं अधिवक्ता संघ के सचिव
अधिवक्ता संघ के सचिव विजय कुमार झा का कहना है कि सभी घटनाओं के आलोक में एक पांच सदस्यीय समिति बनायी गयी है. जिसमें अधिवक्ता विंदेश्वरी प्रसाद सिंह, रमेश प्रसाद जायसवाल, जगदीश प्रसाद साह, कांति बल्लभ झा को रखा गया है. ये समिति अगले सात दिनों के अंदर सही तथ्यों का पता लगा कर अपना प्रतिवेदन कार्यकारिणी समिति के समक्ष रखेगी तथा इस पर समिति द्वारा निर्णय लेकर उच्च न्यायालय को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजा जायेगा.
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