गंगा की माटी से खुशियां बंटोरने वालों को शांति की आस
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :17 Apr 2019 7:39 AM (IST)
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अजित कुमार ठाकुर, कुरसेला : दुल्हन की विदाई हो या दूल्हे की बारात गंगा पार बिना उत्सव की रस्में पूरी नहीं होती. दियारा के गांवों की हर सुख दुख की किस्ती गंगा पार के रास्तों से गुजरती है. जीवन मौत के बीच यहां के लोगों का नदियों के धाराओं से एक अटूट रिश्ता है, जिनके […]
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अजित कुमार ठाकुर, कुरसेला : दुल्हन की विदाई हो या दूल्हे की बारात गंगा पार बिना उत्सव की रस्में पूरी नहीं होती. दियारा के गांवों की हर सुख दुख की किस्ती गंगा पार के रास्तों से गुजरती है. जीवन मौत के बीच यहां के लोगों का नदियों के धाराओं से एक अटूट रिश्ता है, जिनके सहारे बिना यहां के निवासियों का जीवन का आधार निरर्थक बन जाता है. इक्कसवीं सदी के विकास से दूर दियारा के गांवों की जीवन शैली अलग-थलग है.
यहां विकास के लिए शिकवा शिकायतों के बोल प्रस्फुटित नहीं होते. खुशहाली का आधार गंगा मैया पर आश्रित है. दियारा के खेतिहर मजदूर किसान उस समय तड़प उठते हैं, जब बंदूकें गरजती हैं. फसलें लूट ली जाती हैं. गंगा की धारा और बालू पर अधिकार के लिए गैंगवार उनका शांति शुकून छीन ले जाता है. फिजा में तैरती बारुदी गंध रातों की नींद ले जाती है.
विकास के बदले इनकी अपेक्षाएं महज इतनी होती हैं कि दियारा के अमन-शांति में कोई खलल नहीं डाले. खूनी रंजिश से दियारा की धरती रक्त रंजित नहीं बने. खौफ से दियारा की बुनियादी सुविधाओं की आवाज गौण पड़ जाती है. गंगा पार गोबराही, जरलाही, जोनियां, बटेश्वर दियारा क्षेत्र के गांवों में अतिपिछड़ी, पिछड़ी जातियों की एक बड़ी आबादी निवास करती है.
दियारा के बीहड़ों के बीच बसे गांवों में सरकारी तौर पर शिक्षा के समुचित साधन नहीं हैं. प्राइमरी शिक्षा के बाद यहां उच्च शिक्षा प्राप्त करना आसान नहीं है. चिकित्सा व्यवस्था, बिजली, शुद्व पेयजल समेत अन्य मूलभूत सुविधाएं यहां के निवासियों के लिए दिवा स्वपन के समान हैं.
गंगा मैया के भरोसे दियारा में निवास करने वालों ने जीना मरना सीख रखा है. जल जलकर फसलों पर आधिपत्य जमाने के लिए वर्चस्व की लड़ाई से दियारा का क्षेत्र तकरीबन चार दशकों से लहुलूहान होते आया है. अशांति के बीच जीवन गुजारने वाले दियारा के लोग शासन प्रशासन से शांति सुरक्षा की गुहार लगाते आये हैं.
यहां के निवासियों का कहना है कि देश की आजादी के बाद दियारा के भाैगोलिक भू-भाग का क्षेत्र अपराधी दबंगों से आजाद नहीं हो पाया है. लाल कार्ड भूदान व किसानों की जमीन पर मालिकाना अधिकार बड़ी समस्या है.
विवादों की वजहो के पीछे स्थानीय स्तर पर संबंधित विभाग का सरकारी तंत्र दोषी समझा जाता है. इन सब के बावजूद पवित्र पावनि गंगा के तटों के किनारे दियारा में निवास करने वाले जनमानस खुश हैं. इनकी अपेक्षाएं बस शांति, सुकून से जीवन जीने की है.
सतुवा बांध आते हैं मतदान के लिए
दियारा में निवास करने वाले जनमानस की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पूरी आस्था है. मतदान को महापर्व मानकर गोबराही दियारा के मतदाता मतदान के लिए सतुवा बांध आते हैं. दियारा के महिला पुरुष मतदाता गंगा नदी पार कर मीलों पैदल चल कर मतदान केंद्र तक पहुंचते हैं.
मत डाल कर वापस लौटने में सुबह से शाम गुजर जाती है. मतदाता साथ में दिन के भोजन के लिए सतूवा, चूड़ा, रोटी, सूखा भोजन साथ ले जाते हैं. जानकारी के अनुसार गोबराही दियारा का मतदान केंद्र पूर्वी मुरादपुर पंचायतों के आधार पर बसुहार मजदिया व तीनघरिया गांधी ग्राम बिंद टोली के विद्यालयों में होता आया है. इसके बीच गंगा नदी और दियारा गांवों की मीलों दूरी होती है.
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