jehanabad News : बाणासुर को पराजित होता देख युद्ध में उतर गये थे भोलेनाथ

भारत में प्रेम और ऐतिहासिक धरोहरों के नाम कई स्थल प्रसिद्ध हैं, लेकिन प्रेम और युद्ध की कथा जब भी सामने आती है, तो जहानाबाद जिले के वाणावर पहाड़ का नाम अनिवार्य रूप से लिया जाता है.
मखदुमपुर. भारत में प्रेम और ऐतिहासिक धरोहरों के नाम कई स्थल प्रसिद्ध हैं, लेकिन प्रेम और युद्ध की कथा जब भी सामने आती है, तो जहानाबाद जिले के वाणावर पहाड़ का नाम अनिवार्य रूप से लिया जाता है. वाणावर पहाड़ का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों गीता, महाभारत, विष्णु पुराण और शिव पुराण में भी मिलता है. कहा जाता है कि द्वापर युग में वाणावर में सोनितपुर अवशेष (सोनपुर) के राजा बाणासुर रहते थे, जो महान शिव भक्त और वाणावर पहाड़ स्थित बाबा सिद्धनाथ के परम अनुयायी थे. बाणासुर को भोलेनाथ से यह वरदान प्राप्त था कि वे किसी भी युद्ध में असफल न होंगे. बाणासुर की पुत्री उषा भी भोलेनाथ की परम शिष्या थी. एक दिन उषा ने पहाड़ी इलाके के हथियाबोर में भगवान भोलेनाथ और पार्वती को जलक्रीड़ा करते देखा और भोलेनाथ से मनवांछित फल का आशीर्वाद प्राप्त किया. इसके बाद उषा को सपने में एक राजकुमार दिखाई दिया, जिसकी पहचान उसने अपनी सहेली चित्रलेखा के माध्यम से की. चित्रलेखा, जो बाणासुर के मंत्री कुंभमंडा की बेटी थी, ने योग साधना के द्वारा कई चित्र बनाये. जब उसने अनिरुद्ध का चित्र बनाया, उषा ने उसे देखकर पहचान लिया और खुशीपूर्वक उसे वाणावर बुलाने का निर्णय लिया. चित्रलेखा ने द्वारिका पुरी से अनिरुद्ध को पलंग सहित वाणावर ले आयी. इसके बाद उषा और अनिरुद्ध का प्रेम गहरा हुआ. जब यह खबर बाणासुर को मिली, तो उन्होंने क्रोधित होकर अनिरुद्ध से युद्ध किया और उसे पकड़ लिया. यह जानकारी भगवान श्रीकृष्ण को मिली, जिन्होंने तुरंत बाणासुर से युद्ध करने का निर्णय लिया. युद्ध में बाणासुर को पराजित होते देखकर भगवान भोलेनाथ स्वयं युद्ध में कूद पड़े. इस दौरान सभी देवी-देवताओं ने मध्यस्थता की और बाणासुर का युद्ध समाप्त कराया. अंततः भगवान भोलेनाथ ने अनिरुद्ध और उषा का विवाह संपन्न कराया. वाणावर पहाड़ आज भी उषा और अनिरुद्ध की प्रेमकथा, बाणासुर और भगवान श्रीकृष्ण के युद्ध की कथाओं के कारण धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल के रूप में जाना जाता है. यह स्थल न केवल धार्मिक श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है, बल्कि इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता भी जिले की पहचान को मजबूती प्रदान करती है.
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