जयप्रकाश नारायण का यह सपना आज भी है अधूरा, कभी 'संपूर्ण क्रांति' ने बदल दी थी भारतीय राजनीति की दिशा

Jai Prakash Narayan: जय प्रकाश ज्यादातर पटना में रहते थे. लेकिन वे यहीं से देश की सियासत पर पूरी नजर रखते थे. 1974 में कांग्रेस राज में फैल रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों में बढ़ रहे आक्रोश को जेपी करीब से देख रहे थे. स
जेपी जयंती: आज़ादी के बाद देश को कई उथल-पुथल का सामना करना पड़ा. कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक स्वर तैयार हो रहे थे और जेपी आंदोलन के बाद राजनीतिक ताने-बाने को नए सिरे से बुना जा रहा था. लेकिन समग्रता से देखा जाए तो 1975 में लगी इमरजेंसी के दौरान देश में जो विपक्ष तैयार हुआ उसने भारतीय लोकतंत्र को सजीवता दी.
जय प्रकाश ज्यादातर पटना में रहते थे. लेकिन वे यहीं से देश की सियासत पर पूरी नजर रखते थे. 1974 में कांग्रेस राज में फैल रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों में बढ़ रहे आक्रोश को जेपी करीब से देख रहे थे. सत्ता की अकड़ ने जेपी को अपना राजनीतिक सन्यास तोड़ने पर मजबूर कर दिया था और 70 के दशक में 70 साल का बुजुर्ग भारत की सबसे ताकतवर महिला से भिड़ गया.
5 जून 1974 को 72 वर्ष के बुजुर्ग जय प्रकाश ने पटना कें गांधी मैदान से संपूर्ण क्रांति का नारा दिया. इस नारे के साथ की जेपी लोकनायक बनकर निकले और सत्ता को जन्मसिद्ध अधिकार समझने वालों के सारे भ्रम को तोड़ दिया.
25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान से आवज लगाई. ‘सिंहासन खाली करो…की जनता आती है….’ जेपी के इस नारे के बाद कांग्रेस के पास सत्ता को बचाये रखने का एकमात्र तरीका था और वो था इमरजेंसी. इसके बाद जेपी समेत विपक्ष के सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया.
21 महीने की इमरजेंसी के बाद अब बारी देश की जनता की थी. जिसने जेपी पर अपना पूरा भरोसा जताया था. जय प्रकाश नारायण पहले ही अपना आंदोलन में सत्ता परिवर्तन का नारा दे चुके थे. जिसके बाद जेपी ने कांग्रेस के विकल्प के रूप में एक नई पार्टी को सत्ता में लाने का मन बना लिया. जिसे नाम दिया गया जनता पार्टी. फिर देश की जनता ने ऐसा फैसला सुनाया. जिसमें इंदिरा गांधी और संजय गांधी भी चुनाव हार गये.
जय प्रकाश नारायण व्यक्तिगत तौर पर इंदिरा के खिलाफ नहीं थे. वो उस व्यवस्था के खिलाफ थे. जो समाज में भ्रष्टाचार और सत्ता के लिए कुशासन से पनप रही थी और इसी कुशासन को समाप्त करने के लिए जेपी आंदोलन से कई युवा नेता जुड़ गए जो आज भारतीय राजनीति का बड़ा चेहरा हैं. जिनमें नीतीश कुमार, लालू यादव, शरद यादव और रामविलास पासवान जैसे नाम हैं.
जेपी आंदोलन से निकले नेता अपनी जमीनी संघर्ष के लिए जाने जाते है. 1977 के चुनाव में इंदिरा को खारिज कर जनता पार्टी को देश की जनता ने चुन भी लिया. लेकिन 1980 में इन्हीं नेताओं की महत्वकांक्षाएं एक मुखर जन आंदोलन को ले डूबी और महज दो साल बाद इंदिरा फिर से सत्ता में लौट आयीं. लेकिन ये सब देखने के लिए तब तक बिहार के सिताब दियारा का चमकता सितारा जय प्रकाश नारायण जीवित नहीं थे. किडनी की गंभीर बिमारी से जुझते हुए जेपी का 8 अक्टूबर 1989 को निधन हो गया. जिसके बाद देश वासियों की आंखों से गम के आंसू निकल गये.
जिस व्यवस्था को बदलने का सपना जय प्रकाश नारायण ने देखा था, वो आज भी पूरा नहीं हो सका. जिस संपूर्ण क्रांति का नारा जेपी ने दिया था. वो आज भी अधूरा है…..
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