नियमों को ताक पर रख कर चल रही दवा दुकानें, एसडीओ की जांच में हुआ बड़ा खुलासा

जिलेभर संचालित में दवा दुकानों की निगरानी को लेकर प्रशासन के दावों की पोल खुल गयी है. लंबे समय से दवा दुकानों की जांच न होने का फायदा उठाकर धड़ल्ले से अवैध कारोबार फल-फूल रहा है.
जमुई. जिलेभर संचालित में दवा दुकानों की निगरानी को लेकर प्रशासन के दावों की पोल खुल गयी है. लंबे समय से दवा दुकानों की जांच न होने का फायदा उठाकर धड़ल्ले से अवैध कारोबार फल-फूल रहा है. बीते गुरुवार की देर शाम एसडीओ सौरभ कुमार द्वारा सदर अस्पताल के समीप स्थित दो दवा दुकानों के औचक निरीक्षण में जो हकीकत सामने आयी है, वह चौंकाने वाली और डराने वाली भी है. हालांकि, एसडीओ सौरभ कुमार द्वारा दवा दुकानों में पाये गये अनियमितता को लेकर दोनों दुकानों को सील कर दिया गया था, लेकिन शनिवार की शाम एक दवा दुकान की संबंधित कागजात के गहन जांच के बाद सील हटा दिया गया है जबकि एक दुकान में अब तक सील लगा हुआ है.
लाइसेंस गायब, फिर भी बिक रही दवाइयां
एसडीओ के निरीक्षण में यह बात प्रमुखता से सामने आयी कि शहर और ग्रामीण इलाकों में कई दुकानें ऐसी हैं जिनके पास या तो वैध लाइसेंस ही नहीं है, या उनका लाइसेंस काफी समय पहले एक्सपायर हो चुका है. नियमतः बिना वैध लाइसेंस के एक गोली बेचना भी अपराध है, लेकिन निगरानी तंत्र की विफलता के कारण ये दुकानदार बेखौफ होकर अपनी दुकानें चला रहे हैं.
न डॉक्टर का पर्चा, न कैश मेमो
निरीक्षण के दौरान दवाओं की बिक्री के तरीकों में भी भारी अनियमितताएं पायी गयी. दुकानदार मुनाफा कमाने के चक्कर में बिना किसी डॉक्टर के पर्चा के लोगों को दवाएं, यहां तक कि प्रतिबंधित और नशीली दवाएं भी उपलब्ध करा रहे हैं. साथ ही दुकानदार ग्राहकों को कैश मेमो नहीं दे रहे हैं. बिल न देने का सीधा अर्थ है टैक्स की चोरी करना और किसी भी गड़बड़ी की स्थिति में सबूत मिटाना. बिना बिल के यह पता लगाना मुश्किल है कि दवा असली है या नकली. दवा दुकानों का नियमित जांच न होने का सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है. बिना विशेषज्ञ की सलाह और बिना रिकॉर्ड के दवाओं का वितरण ””””स्लो पॉइजन”””” का काम कर रहा है. प्रशासन की इस सुस्ती ने अवैध दवा माफियाओं के हौसले बुलंद कर दिए हैं. बिना लाइसेंस वाली दुकानों में दवाओं की गुणवत्ता की कोई गारंटी नहीं होती है. पर्चे के बिना दवा मिलने से युवाओं में नशीली दवाओं का प्रचलन बढ़ रहा है. बिल न मिलने से गलत दवा के कारण होने वाली अनहोनी पर दुकानदार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं. एसडीओ की इस कार्रवाई ने स्वास्थ्य विभाग और औषधि विभाग की कार्यशैली पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिये हैं. अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में खानापूर्ति करती है या इन ””मौत के सौदागरों”” पर कोई ठोस कार्रवाई भी होगी.
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