JP JAYANTI: देश में गूंज रहा था 'इंदिरा' का नारा, तब जेपी ने क्रांति की राह पर दिखाई बदलाव का सवेरा

jai prakash narayan: 1947 में महात्मा गांधी की क्रांति ने देश को आजादी तो दिलाई. लेकिन पूर्ण स्वराज का सपना पूरा नहीं हो सका. इसलिए 1974 में क्रांति की चिंगारी एक बार फिर इतिहास की किताबों से निकालकर देश के युवाओं के दिलों में जल उठी थी.
पटना: ‘सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है…दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो..सिंहासन खाली करो कि जनता आती है. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने ये पंक्तियां तब लिखी थी, जब जेपी देश के युवा आंदोलनकारियों का नेतृत्व कर रहे थे.
1947 में मिली आजादी के बाद देश में क्रांति नाम का शब्द इतिहास के पन्नों में गुम हो रहा था. महात्मा गांधी की क्रांति ने देश को आजादी तो दिलाई. लेकिन पूर्ण स्वराज का सपना पूरा नहीं हो सका. इसलिए 1974 में क्रांति की चिंगारी एक बार फिर इतिहास की किताबों से निकालकर देश के युवाओं के दिलों में जल उठी.
गुजरात से बिहार तक फैल रहे इस आंदोलन को एक ऐसे मार्गदर्शक की तलाश थी. जो उन्हें क्रांति की राह पर बदलाव का सवेरा दिखा सके. इन सब के बीच अंदोलनकारियों ने अपना नया नायक चुन लिया था. नाम था लोकनायक जय प्रकाश नारायण और नारा था संपूर्ण क्रांति.
‘हजारों की तादाद में सत्याग्रही जाएंगे, उन सत्याग्रहियों में जयप्रकाश नारायण भी होगा….मैं भी सत्याग्रह करूंगा और वहां चाहे मेरी गिरफ्तारी हो चाहे जो भी हो…अब न्याय होगा….जमाना पलटा है. अब क्रांति होगी…ये सारा संघर्ष चलेगा…’
ये वो दौर था. जब देश में इंडिया इज इंदिरा और इंडिया इज इंदिरा का नारा गूंजा करता था. ये वो दौर भी था जब सत्ता के अहंकार में आम लोगों की परेशानियों को दबायी जा रही थी. ऐसे में देश को केवल एक आवाज पर भरोसा था. वो आवाज थी जय प्रकाश नारायण की.
‘छात्रों और जनता के आंदोलन में जो मुख्य बात उठायी गयी थी. वो यह थी कि प्रशासनिक और चुनाव संबंधी सुधार किये जाएं जिससे कि चुनाव सस्ते हो और सही तौर पर प्रतिनिधित्व संभव हो…जिससे की प्रशासन जनता के निकट आए….’
जय प्रकाश नरायण न तो कोई संसाद थे और न ही वे दिल्ली में रहते थे. लेकिन देश के लिए जब कुछ कहते तो लोग उन्हें गंभीरता के साथ सुनते थे और उनकी बातों पर भरोसा भी किया करते थे. महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने वाले जेपी हमेशा सत्ता के मोह से दूर रहे. हालांकि जवाहर लाल नेहरू उनको एक बड़ी भूमिका देना चाहते थे. लेकिन जय प्रकाश की सोच तय रास्तों से अलग थी. वो सत्ता से दूर रहकर लोगों के अधिकार के लिए लड़ना चाहते थे. उनकी छवी एक ऐसे साधु-संत के रूप में थी. जिसे लोग प्यार से जेपी या फिर लोकनायक के नाम से बुलाती है.
(Gaurav kumar)
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