घर-परिवार छोड़ शिक्षा की लौ जला रहे विजय

Published at :24 Feb 2017 8:14 AM (IST)
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घर-परिवार छोड़ शिक्षा की लौ जला रहे विजय

शिक्षक की नौकरी छोड़ गांव के बच्चों को पढ़ाते हैं नि:शुल्क सुरेश कुमार राय भोरे : जिंदगी किसी से कब कौन-सा काम ले ले, इसका अंदाजा किसी को नहीं है. लेकिन, एक जुनून को लेकर अपना सर्वस्व न्योछावर करनेवाले कम ही लोग मिलेंगे. जब इस जुनून को कोई अपना मिशन बना ले, तो समाज में […]

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शिक्षक की नौकरी छोड़ गांव के बच्चों को पढ़ाते हैं नि:शुल्क
सुरेश कुमार राय
भोरे : जिंदगी किसी से कब कौन-सा काम ले ले, इसका अंदाजा किसी को नहीं है. लेकिन, एक जुनून को लेकर अपना सर्वस्व न्योछावर करनेवाले कम ही लोग मिलेंगे. जब इस जुनून को कोई अपना मिशन बना ले, तो समाज में वह एक मिसाल बन जाता है. ऐसे ही हैं विजय कुमार गुरु जी. विजय ने अपने इस जुनून को लेकर न सिर्फ अपनी नौकरी ही छोड़ी, बल्कि अपने घर-परिवार को भी त्याग दिया. आज विजय घूम-घूम कर बच्चों के बीच शिक्षा की लौ जला रहे हैं.
इस कार्य में कोई आड़े न आये, इसलिए उन्होंने अपने गृहस्थ जीवन को भी त्याग दिया. मूलत: सीवान जिले के हसनपुरा के रहनेवाले विजय कुमार उर्फ गुरु जी एमएससी, एमएड योग्यताधारी हैं. इनका चयन बिहार सरकार के शिक्षा विभाग में हाइस्कूल के विज्ञान शिक्षक के रूप में हुआ था. अध्यापन कार्य करते समय ही इनके मन में एक टीस उठती थी कि जिस शिक्षा को बांटने से वह और बढ़ती है, उस शिक्षा को देने के लिए हम पैसे क्यों लेते हैं. धीरे-धीरे यह सोच विजय का जुनून बनता चला गया.
इसी बीच वर्ष, 2005 में विजय एक बस की चपेट में आ गये. इस बीच उनका एक पैर बेकार हो गया. इलाज के क्रम में बिस्तर पर पड़े-पड़े उनके मन में एक टीस पैदा करने लगी. ठीक होने के बाद वे अपने अध्यापन कार्य को त्याग कर शिक्षा की लौ जलाने के लिए घर-परिवार छोड़ बाहर निकल गये. गुरु जी शादीशुदा हैं. उनके दो बच्चे हैं. घूमते-घूमते वे दस साल पहले फुलवरिया पहुंचे और स्टेशन के पास सोये हुए थे. उनकी बात करने की शैली को देख कर ग्रामीणों ने उन्हें अपने यहां रहने का न्योता दिया. उन्होंने स्वीकार कर लिया. पास ही रेलवे के एक बेकार पड़े भवन में योगी राज गुरुकुल की स्थापना की गयी. बच्चे वहां शिक्षा ग्रहण करने आने लगे.
गुरु जी सुबह और शाम बच्चों को पढ़ाते हैं. उनके योगीराज गुरुकुल में वे सभी नियम हैं, जो पहले के जमाने के गुरुकुलों में हुआ करते थे. लगभग पांच गांवों के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं.
इस कार्य के बदले वे बच्चों से कुछ नहीं लेते. हां! ग्रामीण उनके पेट के लिए रोटी और तन ढकने के लिए कपड़े का जुगाड़ करते हैं. गुरु जी इस मिशन को रोकना नहीं चाहते. वे कहते हैं कि उनका यह सोच सिर्फ इसलिए आया था कि इस आधुनिक युग में शिक्षा जिस तरह महंगी हो रही है, उससे हर कोई उच्च शिक्षा नहीं ले पाता. इसे ध्यान में रखते हुए मैंने सब कुछ छोड़ कर शिक्षा की लौ जलाने की ठानी और वो आज पूरी तरह जल रही है. दिव्यांग विजय को लोग गुरु जी के नाम से जानते हैं. सुबह छह बजे से नौ बजे तक और शाम को चार बजे से छह बजे तक बच्चों को पढ़ाते हैं. उनके द्वारा पढ़ाये गये बच्चे आज कई ऊंचे पदों पर पदस्थापित हैं.
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