भसही में गंडक से िनर्माणाधीन बांध पर खतरा

Published at :04 Sep 2017 9:47 AM (IST)
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भसही में गंडक से िनर्माणाधीन बांध पर खतरा

गंडक की त्रासदी घटने की जगह और बढ़ती जा रही है. नदी ने अपना उग्र रूप अख्तियार कर लिया है. चार गांवों को उजाड़ने के बाद नदी अब बांध के लिए खतरा बन गयी है. यहां बात जब बांध की आयी है, तो विभाग की बेचैनी बढ़ी है. आइए बताते हैं पूरा मामला. कालामटिहनिया : […]

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गंडक की त्रासदी घटने की जगह और बढ़ती जा रही है. नदी ने अपना उग्र रूप अख्तियार कर लिया है. चार गांवों को उजाड़ने के बाद नदी अब बांध के लिए खतरा बन गयी है. यहां बात जब बांध की आयी है, तो विभाग की बेचैनी बढ़ी है. आइए बताते हैं पूरा मामला.
कालामटिहनिया : गंडक नदी की धारा और उग्र हो गयी है. भसही में नदी उलटी बहने लगी है. नदी का सीधा अटैक होने के कारण अब तक चार गांव उजड़ गये हैं.
नदी अहिरौलीदान विशुनपुर के बीच बनाये जा रहे गाइड बांध तक पहुंच गयी है. नदी के तेज कटाव से ग्रामीण सहमे हुए हैं. ग्रामीणों का मानना है कि जिस रफ्तार से कटाव हो रहा उससे अब दिखने लगा है कि दो चार दिनों में बांध भी नदी में समा जायेगा. बांध से महज तीन सौ मीटर दूर नदी का कटाव हो रहा. शनिवार को नदी एक हजार मीटर दूर थी. यहां भसहीं, दलित बस्ती तथा कालामटिहनिया वार्ड नं एक बसता था. गांव को तेजी से काटते हुए नदी अब बांध के करीब पहुंच चुकी है. रविवार की सुबह नदी के कटाव को देख बाढ़ नियंत्रण विभाग के अभियंताओं के होश उड़ गये हैं.
अधीक्षण अभियंता ने मौके पर पहुंच कर स्थिति को देखने के बाद तत्काल बोल्डर से बचाव कार्य शुरू करने का निर्णय लिया. यहां आनन-फानन में अभियंता गिरजा शंकर मौर्य, टीपी सिंह, अनिल कुमार पहुंच कर संवेदकों के साथ बचाव कार्य की तैयारी में जुट गये हैं. यहां बोल्डर गिराने का काम तेज हो गया है. बांध को बचाने के लिए बोल्डर से आइरन कैरेट डाल कर इसे बचाने की कोशिश हो रही है. यह कोशिश कितनी कामयाब होगी, यह तो वक्त बतायेगा, लेकिन विभाग इस तरह की कोशिश गांव को बचाने के लिए की होती, तो शायद यहां के 500 परिवार विस्थापित नहीं होते.
और उजड़ गयी अंतिम निशानी : भसहीं गांव के पास निशानी के रूप में पीपल का वृक्ष था, जो रविवार की शाम नदी में समा गया. पीपल के वृक्ष की पूजा यहां ब्रह्म स्थान के रूप में की जाती थी. यहां बगल में ही गांव के रामाधार तिवारी का मकान था. कल तक लगता था कि यह घर भसहीं की अंतिम निशानी के रूप में बच जायेगा, लेकिन नदी के कटाव को देख रामाधार तिवारी ने भी अपने घर को तोड़ना शुरू कर दिया. रविवार को पूरा गांव साफ हो गया. नदी का वेग हर पल उग्र होकर अब बांध को अपने आगोश में लेने पर उतारू है.
विशंभरपुर स्कूल पर घटा दबाव : भसहीं में नदी का सीधा अटैक होने से विशंभरपुर में नदी का दबाव कम हो गया है. जिससे प्लस टू स्कूल, मध्य विद्यालय तथा विशंभरपुर बाजार बचने की उम्मीद बढ़ गयी है. स्कूल के करीब नदी पहुंच कर शांत हो गयी है. यहां उग्र हुई ,तो यहां के तीन सौ परिवार पर फिर उजड़ने का खतरा उत्पन्न हो जायेगा. वैसे फुलवरिया गांव के लोगों की नींद भी उड़ी हुई है. नदी का कब रुख बिगड़ जाये, कहना मुश्किल है.
इनके लिए अभिशाप बन गया महासेतु का निर्माण
बाढ़ नियंत्रण विभाग के एक्सपर्ट मानते हैं कि मंगलपुर-जादोपुर के बीच बनाये गये महासेतु पुल के कारण नदी कालामटिहनिया के लिए अभिशाप बन गयी है.
नदी के मुहाने को 18.2 किमी में गाइड बांध बांध कर महज 1.8 किमी में छोड़ दिया गया. बेतिया की तरफ से तीन सहायक नदियां बहती थीं, जिनको बंद कर दिया गया था. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आदेश पर दो मुहानाें को खोला गया. आज भी बेतिया क्षेत्र में मुहाना नहीं खुल सका. नतीजा है कि नदी कालामटिहनिया की तरफ डायवर्ट होकर गांव को उजाड़ रही है.
आशियाना हुआ बेगाना, तटबंध बना सहारा : गोपालगंज . सिकटिया सलेमपुर रिंगबांध पर 30 से अधिक पॉलीथिन टैंट गिरे है. बच्चे खेल रहे हैं, तो कुछ बच्चे सो रहे है. बाहर बैठे हैं रामधनी सहनी बाढ़ का हाल पूछने पर कहते हैं कि तटबंध ही सहारा है. अपना घर तो बेगाना हो गया है. पानी हटेगा तब न मड़ई पलानी सीधा करेंगे. भगवान भरोसे जिंदगी कट रही है. आगे बढ़ने मिलते हैं. दशरथ सहनी कहते हैं कि दिन में हम लोग सो लेते है. रात तो टकटकी में ही बात जाती है. कभी जहरीले सांप आते हैं तो कभी किसिम-किसिम के कीड़े, लेकिन इस बार सब कुछ छिन गया.
बात भी सत्य है. रिंग बांध की एक तरफ गंडक से जुड़ा भागर जलाशय है, तो दूसरी तरफ डेढ़ हजार आबादी वाला सिकटिया गांव. नदी और गांव के बीच फासला सिर्फ तटबंध का है, लेकिन ग्रामीणों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि बाढ़ यहां भी तबाही मचायेगी. तटबंध पर शरण लिये गौतम सहनी बताते हैं कि इस गांव के लिये बाढ़ एक किस्सा है. तटबंध किनारे रहते भी बाढ़ देखने हम लोग दूसरे गांव जाते थे. यहां वर्ष 1994 में बाढ़ आयी थी. उस समय भी भारी तबाही मची थी. 63 वर्ष बाद गंडक मईया ने एक बार फिर हमलोगों का समूल नष्ट कर दिया है.
अधिकतर झोंपड़ियां के घर गिर चुके हैं. पक्के मकान वाले छत पर शरण लिये हैं. इन लोगों का रोजगार छीन चुका है. अधिकतर मछली का रोजगार करते है. बाढ़ में तीन करोड़ से अधिक की मछलियां बह चुकी हैं. तटबंध पर बैठा राजू कहता है कि घर गया, रोजी-रोटी भी खत्म हो गयी. अब बच्चों की परवरिश कैसे होगी. यह सवाल सिकटिया के डेढ़ हजार लोगों के मानस पटल पर कौध रहा है, जिन्हें गंडक की धारा ने कहीं का नहीं छोड़ा है
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