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संस्कृति व सभ्यता के मूल स्वरूप को संरक्षित रखना मुश्किल

Updated at : 10 Jul 2025 7:56 PM (IST)
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संस्कृति व सभ्यता के मूल स्वरूप को संरक्षित रखना मुश्किल

संस्कृति व सभ्यता के मूल स्वरूप को संरक्षित रखना मुश्किल

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राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस के उपलक्ष्य में सीयूएसबी में संगोष्ठी का आयोजन

वरीय संवाददाता, गया जी.

राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस के अवसर पर केंद्रीय विश्वविद्यालय दक्षिण बिहार (सीयूएसबी) के शिक्षक शिक्षा विभाग एवं समाजशास्त्रीय अध्ययन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय संस्कृति और परंपरा’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. कुलपति प्रो कामेश्वर नाथ सिंह के संरक्षण में आयोजित इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी बड़ी संख्या में शामिल हुए. कार्यक्रम की जानकारी देते हुए पीआरओ मोहम्मद मुदस्सीर आलम ने बताया कि संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में शिक्षा संकाय के डीन प्रो रविकांत उपस्थित थे. साथ ही शिक्षा विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ तरुण कुमार त्यागी एवं समाजशास्त्रीय अध्ययन विभाग के वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर डॉ. हरेश नारायण पांडेय ने विचार साझा किये.

छात्र–शिक्षक संवाद और ज्ञान परंपरा पर बल

अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. रविकांत ने छात्र और शिक्षक के संबंधों की ऐतिहासिक भूमिका पर चर्चा की. उन्होंने विद्यार्थी पंच लक्षणम् चेष्टा, ध्यान, निद्रा, आलस्य और पढ़ाई के लिए घर छोड़ने की अवधारणा को रेखांकित किया. साथ ही सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के विस्तार के बीच बदलते छात्र–शिक्षक संबंधों पर भी विचार रखे. उन्होंने सुकरात, प्लेटो और अरस्तू के संवाद के उदाहरण देते हुए वस्तुनिष्ठ ज्ञान के विकास की प्रक्रिया को रेखांकित किया.

भारतीय संस्कृति के आयामों पर विमर्श

डॉ हरेश नारायण पांडेय ने भारतीय संस्कृति के भौतिक और अभौतिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की और चेतना को भारतीय सभ्यता की आत्मा बताया. उन्होंने भगवद्गीता जैसे ग्रंथों के संदर्भ से मन, बुद्धि, आत्मा और कर्म के अंतर्संबंध को समझाया. उन्होंने कहा कि बदलते समय में भारतीय संस्कृति और मूल्यों को संरक्षित रखना कठिन होता जा रहा है, पर इसका निरंतर प्रयास होना चाहिए. डॉ. तरुण त्यागी ने अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक और पारंपरिक प्रक्रियाओं के सम्मिश्रण की महत्ता पर प्रकाश डाला. साथ ही रोजगारपरकता की दृष्टि से हमारी परंपरागत ज्ञान प्रणालियों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया.

शोधार्थियों की भागीदारी और विमर्श

शोधार्थी श्वेतांक ने द्वैत-अद्वैत दर्शन और शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, माधवाचार्य के विचारों का उल्लेख करते हुए संवाद और वाद-विवाद की परंपरा पर विस्तार से प्रकाश डाला. वहीं, शोध छात्रा गरिमा शुक्ला ने यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता श्लोक का जाप करते हुए भारतीय संस्कृति में महिलाओं के महत्व को रेखांकित किया. कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र अंशुमाली कुमार मिश्रा ने किया. इस अवसर पर सहायक निदेशक शारीरिक शिक्षा डॉ जेपी सिंह, संजय वर्मा, अनन्या राजलक्ष्मी, सौरभ, ऋतिक, कुंदन समेत कई शोधार्थियों की सक्रिय उपस्थिति रही.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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KALENDRA PRATAP SINGH

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