Gaya News : प्रभात खास : मोरिंगा पाउडर बना रोजगार की उम्मीद, गया-जहानाबाद के 300 परिवारों को मिला सहारा

Published by : PANCHDEV KUMAR Updated At : 28 May 2025 10:28 PM

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वन विभाग की ओर से संचालित की जा रही सहजन पावडर उत्पादन परियोजना

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अजीत कुमार, बेलागंज

गया-जहानाबाद जिले के बेलागंज व वाणावर पहाड़ के इलाके में मुनगा (मोरिंगा) की पत्तियों से बनने वाला पाउडर स्थानीय वनवासी समुदाय के लिए आजीविका का मजबूत स्रोत बन चुका है. वन विभाग और वन समिति के संयुक्त प्रयास से चल रही मोरिंगा प्रोसेसिंग यूनिट से 16 गांवों के 300 घरों को रोजगार मिला है.

25 एकड़ में लगे दो लाख मोरिंगा के पेड़

वन विभाग की पहल पर वाणावर वन क्षेत्र के साकिर बिगहा, भैख और जमनगंज पंचायतों में 25 एकड़ में करीब दो लाख मोरिंगा के पेड़ लगाये गये हैं. स्थानीय महिलाओं और वनवासियों से 40 रुपये प्रति किलो की दर से पत्तियों की खरीद कर यूनिट में इसका पाउडर तैयार किया जा रहा है. इस कार्य से सैकड़ों लोग न सिर्फ रोजगार पा रहे हैं, बल्कि स्वास्थ्य, पोषण और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में भी योगदान दे रहे हैं.

स्वास्थ्य और पोषण का समृद्ध स्रोतमोरिंगा को ‘सुपरफूड’ कहा जाता है. इसके पत्तों में विटामिन सी, कैल्शियम, विटामिन ए, आयरन, पोटैशियम और कैरोटीन, फ्लैवोनोइड जैसे एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, मोरिंगा का नियमित सेवन कुपोषण, एनीमिया, हड्डियों की कमजोरी और रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी जैसी समस्याओं में फायदेमंद है.

जल और पर्यावरण संरक्षण में भी सहायकवन समिति के अध्यक्ष सुधीर शर्मा ने बताया कि मोरिंगा उत्पादन और प्रसंस्करण के जरिये यह क्षेत्र आजीविका, पोषण और पर्यावरण संरक्षण के एक सफल मॉडल के रूप में उभर रहा है. वाणावर वन क्षेत्र सूखाग्रस्त इलाका माना जाता है, लेकिन मोरिंगा के पेड़ जल संरक्षण और हरियाली बढ़ाने में मदद कर रहे हैं.

महिलाओं को मिला आत्मनिर्भरता का रास्तासाकिर बिगहा पंचायत की मुखिया सोनाली कुमारी ने बताया कि इस यूनिट के माध्यम से महिलाओं को न सिर्फ रोजगार मिला है, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन की दिशा में भी वे आगे बढ़ रही हैं. यूनिट में कार्य कर रही महिला लाभार्थियों ने इसे सरल, सुलभ और स्थायी जीविकोपार्जन का माध्यम बताया.

संभावनाओं से भरी राहयह पहल वन संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण विकास और पोषण सुरक्षा का उत्कृष्ट उदाहरण है. यदि इसी तरह के प्रयास अन्य वन क्षेत्रों में भी दोहराये जाएं, तो देशभर में वनवासी समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन संभव है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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