गया जी में तिरंगे के लिए दी शहादत, कोतवाली पर झंडा फहराते समय अंग्रेजों की गोली से शहीद हुए थे तीन वीर
गया- कोतवाली के पास स्थित शहीद स्मारक | Prabhat Khabar Network
जानें कैसे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गया के तीन वीर सपूतों, जगन्नाथ मिश्र, भुई राम और कैलाश राम ने कोतवाली पर तिरंगा फहराते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। उनकी शहादत आज भी प्रेरणा देती है.
Gaya Ji News: आजादी की लड़ाई के इतिहास में गया की धरती भी उन वीर सपूतों की शहादत की गवाह रही है, जिन्होंने तिरंगे की आन और देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिये. वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गया शहर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ऐसा ही एक साहसिक अध्याय लिखा गया था. कोतवाली थाने पर लगे अंग्रेजों के यूनियन जैक को उतारकर तिरंगा फहराने की कोशिश में जगन्नाथ मिश्र, भुई राम और कैलाश राम ने ब्रिटिश हुकूमत की गोलियां खाकर शहादत दी थी.
कॉटन मिल से निकला था विशाल जुलूस
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा नौ अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किये जाने के बाद देशभर में आजादी की आवाज तेज हो गयी थी. गया में भी इस आंदोलन का व्यापक असर देखने को मिला. गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद शहर के उत्तरी क्षेत्र स्थित कॉटन मिल से बड़ी संख्या में स्वतंत्रता सेनानी और देशभक्त तिरंगा लेकर जुलूस में शामिल हुए.
सैकड़ों लोगों का यह जुलूस देशभक्ति के नारों के साथ शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरता हुआ जीबी रोड स्थित कोतवाली थाना के पास पहुंचा. उस समय कोतवाली थाने पर ब्रिटिश हुकूमत का यूनियन जैक फहरा रहा था. देशभक्तों के लिए यह झंडा गुलामी का प्रतीक था और उनका लक्ष्य वहां तिरंगा फहराना था.
तिरंगा फहराते ही बरसने लगीं गोलियां
जुलूस के कोतवाली पहुंचने के बाद जगन्नाथ मिश्र, भुई राम और कैलाश राम आगे बढ़े. तीनों ने अंग्रेजों के झंडे को उतारकर उसकी जगह तिरंगा फहराने का प्रयास किया. इसी दौरान ब्रिटिश हुकूमत ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं.
अंग्रेजी शासन की बंदूकों से निकली गोलियों के सामने भी इन स्वतंत्रता सेनानियों ने पीछे हटना स्वीकार नहीं किया. गोलीबारी में भुई राम और जगन्नाथ मिश्र गंभीर रूप से घायल हुए और घटनास्थल पर ही शहीद हो गये. वहीं कैलाश राम भी गोली लगने के बाद घायल अवस्था में धामी टोला की ओर पहुंचे, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली और देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिये.
तीनों शहीदों की याद में बने स्मारक
गया में आज भी इन तीनों वीरों की शहादत की यादें जीवित हैं. कोतवाली थाने के पास शहीद स्मारक के अलावा केपी रोड स्थित धामी टोला में भी शहीदों की स्मृति को संजोया गया है.
हर वर्ष अगस्त क्रांति और स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर विभिन्न सामाजिक एवं राजनीतिक संगठनों के लोग इन शहीद स्मारकों पर पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले इन वीरों को याद करते हुए लोग उनके बलिदान को नमन करते हैं.
तिरंगे के लिए जान देने वालों की कहानी
जगन्नाथ मिश्र, भुई राम और कैलाश राम की कहानी केवल तीन व्यक्तियों की शहादत नहीं, बल्कि उस दौर के जनआंदोलन और देशभक्ति की भावना का प्रतीक है. अंग्रेजी शासन के खिलाफ देशभर में जब भारत छोड़ो आंदोलन जोर पकड़ रहा था, तब गया के आम लोगों ने भी आजादी की लड़ाई में अपनी भूमिका निभायी.
कोतवाली पर तिरंगा फहराने का प्रयास उस समय बेहद जोखिम भरा था. ब्रिटिश शासन के खिलाफ खुलकर खड़े होने का मतलब गिरफ्तारी, यातना और गोली का सामना करना था. इसके बावजूद इन तीनों वीरों ने राष्ट्रीय ध्वज को गुलामी के प्रतीक यूनियन जैक की जगह स्थापित करने का प्रयास किया.
आज भी याद किया जाता है बलिदान
आजादी के दशकों बाद भी गया में इन तीनों शहीदों का बलिदान लोगों की स्मृतियों में जीवित है. अगस्त क्रांति दिवस के मौके पर नौ अगस्त के साथ-साथ 13 अगस्त को भी विभिन्न संगठनों के नेता और कार्यकर्ता शहीद स्मारकों पर पहुंचते हैं और नम आंखों से श्रद्धांजलि देते हैं.
शहीद स्मारक आज की पीढ़ी को यह याद दिलाता है कि देश की आजादी आसानी से नहीं मिली थी. इसके लिए हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष किया और अनेक लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी. गया के ये तीन वीर भी उसी गौरवशाली इतिहास का हिस्सा हैं.
जगन्नाथ मिश्र, भुई राम और कैलाश राम ने जिस तिरंगे के लिए अपनी जान कुर्बान की, वही तिरंगा आज स्वतंत्र भारत की पहचान है. उनकी शहादत आने वाली पीढ़ियों को देश, लोकतंत्र और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान की प्रेरणा देती रहेगी.
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