गयाजी में गरीबी की मार, नन्हे कंधों पर घर की जिम्मेदारी, लकड़ी चुनकर चूल्हा जलाने को मजबूर बच्चियां

Published by : Sakshi kumari Updated At : 07 Jun 2026 2:28 PM

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लकड़ी चुन रहीं बच्चियां

Gayaji News: गयाजी में कई गरीब और महादलित परिवारों के बच्चे आज भी बचपन जीने के बजाय परिवार की जिम्मेदारियां उठाने को मजबूर हैं.

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गयाजी से मुकेश पाण्डेय की रिपोर्ट
Gayaji News:
विकास और सरकारी योजनाओं के दावों के बीच गयाजी जिले के मोहड़ा प्रखंड के टेटुआ टार गांव की तस्वीर एक अलग ही कहानी बयां करती है. यहां कई गरीब और महादलित परिवारों के बच्चे आज भी बचपन जीने के बजाय परिवार की जिम्मेदारियां उठाने को मजबूर हैं. भोजन पकाने के लिए ईंधन की व्यवस्था नहीं होने के कारण नाबालिग बच्चियां रोज जंगल, बगीचे और खेतों से लकड़ियां चुनकर घर लाती हैं.

अनाज मिल रहा, लेकिन चूल्हा जलाने का संकट बरकरार

गांव की बच्चियां सीमा कुमारी, सुलेखा कुमारी और अंजनी कुमारी बताती हैं कि राशन दुकान से परिवार को अनाज तो मिल जाता है, लेकिन भोजन पकाने के लिए ईंधन की कोई व्यवस्था नहीं है. ऐसे में चूल्हा जलाने के लिए रोजाना लकड़ी चुनना उनकी मजबूरी बन गई है.

सुबह से शुरू हो जाता है संघर्ष

बच्चियों के अनुसार वे सुबह होते ही आसपास के खेतों, बगीचों और खाली जगहों में लकड़ी तलाशने निकल जाती हैं. कई बार उन्हें कई किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है. घंटों की मेहनत के बाद ही इतना जारन (लकड़ी) जुट पाता है कि घर में एक समय का भोजन बन सके.

पढ़ाई पर पड़ रहा सीधा असर

रोजाना लकड़ी इकट्ठा करने में लगने वाले समय का असर उनकी पढ़ाई पर भी पड़ रहा है. स्कूल जाने और पढ़ने की उम्र में ये बच्चियां परिवार की जरूरतों को पूरा करने में लगी हुई हैं. जिम्मेदारियों का बोझ उनके बचपन पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है.

महादलित परिवारों की बदहाली की तस्वीर

ग्रामीणों का कहना है कि गांव के कई महादलित और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं. रसोई गैस जैसी सुविधाएं या तो उपलब्ध नहीं हैं या फिर नियमित रूप से उनका उपयोग कर पाना परिवारों के लिए संभव नहीं है.

ग्रामीणों ने की स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने की मांग

स्थानीय लोगों ने सरकार और प्रशासन से मांग की है कि गरीब परिवारों को स्वच्छ ईंधन और रसोई गैस की नियमित सुविधा उपलब्ध कराई जाए. उनका कहना है कि इससे बच्चों को लकड़ी चुनने की मजबूरी से मुक्ति मिलेगी और वे अपनी पढ़ाई तथा भविष्य पर ध्यान दे सकेंगे.

बचपन पर भारी पड़ रही गरीबी

टेटुआ टार गांव की यह तस्वीर बताती है कि कई परिवारों तक सरकारी योजनाओं का लाभ आंशिक रूप से तो पहुंचा है, लेकिन जीवन की मूलभूत जरूरतें अब भी पूरी नहीं हो पा रही हैं. नतीजतन, नन्हे हाथ किताबों की जगह लकड़ियां ढोने को मजबूर हैं और गरीबी उनके बचपन को धीरे-धीरे निगल रही है.

एक तस्वीर से कई सवाल

जब देश बच्चों की शिक्षा, पोषण और उज्ज्वल भविष्य की बात कर रहा है, तब टेटुआ टार की बच्चियां रोज चूल्हा जलाने के लिए लकड़ियां बटोर रही हैं. यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उन हजारों गरीब परिवारों की हकीकत है जहां आज भी दो वक्त की रोटी जुटाना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.

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Sakshi kumari

लेखक के बारे में

By Sakshi kumari

साक्षी देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की धरती सीवान से आती हैं. पत्रकारिता में करियर की शुरुआत News4Nation के साथ की. 3 सालों तक डिजिटल माध्यम से पत्रकारिता करने के बाद वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल के साथ कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. बिहार की राजनीति में रुचि रखती हैं. हर दिन नया सीखने के लिए इच्छुक रहती हैं.

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