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Gaya News : महाबोधि मंदिर और बोधगया मठ की ऐतिहासिक सच्चाई व भ्रामक दावों का तथ्यपरक विश्लेषण को लेकर बोधगया मठ में आयोजित हुई प्रेसवार्ता

बोधगया़

बोधगया मठ में मंगलवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोधगया मठ के स्वामी विवेकानंद गिरि द्वारा विभिन्न ऐतिहासिक प्रमाण और दस्तावेजों के आधार पर महाबोधि मंदिर के इतिहास तथा बोधगया मठ का महाबोधि मंदिर पर प्रबंधन और देखरेख के संबंध में विस्तृत जानकारी दी. उन्होंने बताया कि महाबोधि मंदिर पूरी दुनिया में आपसी प्रेम और भाईचारे का प्रतीक है. सदियों से जब यह मंदिर मठ के नियंत्रण में रहा था, तब बोधगया मठ के महंत द्वारा ही विश्व के सभी देशों से आने वाले बौद्ध श्रद्धालुओं की व्यवस्था और उनके रहने से संबंधित सुविधाएं किया जाता रहा है. मंदिर में बौद्ध और हिंदू के बीच पूजा-पाठ तथा किसी भी प्रकार की समस्या कभी उत्पन्न नहीं हुआ.

उन्होंने कहा कि वर्तमान का बोधगया मंदिर संचालन के लिए बीटीएमसी का निर्माण में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेंद्र प्रसाद, लाला लाजपत राय सहित अनेक महापुरुषों की इच्छाएं और संकल्पनाओं का यह परिणाम है. उन्होंने कांग्रेस द्वारा आयोजित 1922 में राष्ट्रीय अधिवेशन में सात सदस्यीय समिति, जिसके अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद थे, के द्वारा ही सर्वप्रथम महाबोधि मंदिर के लिए हिंदू तथा बौद्धों की सम्मिलित समिति के निर्माण के संबंध में सुझाव दिया गया, जो बाद में बीटीएमसी के रूप में क्रियान्वित किया गया. उन्होंने बताया कि बीटीएमसी 1949 में बनने के बाद महाबोधि मंदिर का प्रबंधक मठ ने डॉ राजेंद्र प्रसाद के आग्रह और निवेदन पर किस प्रकार 1952 में बिहार सरकार के साथ समझौते के माध्यम से महंत ने बीटीएमसी को सौंपा. बोधगया मठ और बिहार सरकार के बीच समझौता के अनुसार ही महाबोधि महाविहार में पांच पांडव, महंतों की समाधि, पुजारी का कमरा व अन्य हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों की स्थापना है. समझौते की तिथि से आज तक इस प्रकार जिला प्रशासन के देखरेख में महाबोधि मंदिर का संचालन किया जा रहा है. प्रेसवार्ता में विष्णुपद मंदिर प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष शंभूलाल बिट्ठल, होटल एसोसिएशन बोधगया के अध्यक्ष जय सिंह, महासचिव संजय सिंह, रणविजय सिंह, शंकर यादव, सुरेंद्र गुप्ता, बोधगया ट्रैवल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष,पूर्व सांसद हरि मांझी, मणिलाल बारीक, क्षितिज मोहन सिंह, संजय यादव सहित अन्य मौजूद थे.

महाबोधि मंदिर तथा बोधगया की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करने का षड्यंत्र

स्वामी विवेकानंद गिरि ने बताया कि महाबोधि मंदिर के गर्भगृह में भगवान बुद्ध की वर्तमान मूर्ति बोधगया के संन्यासियों द्वारा प्राण प्रतिष्ठा के माध्यम से स्थापित किया गया है, जिसको लेकर आज तक कभी भी किसी प्रकार का कोई विरोध नहीं हुआ. हिंदू और बौद्ध धर्म के श्रद्धालु प्रेमपूर्वक आपसी सद्भाव के साथ मंदिर में पूजा -पाठ करते हैं. इस बातों का उल्लेख कनिंघम के सहयोगी जीडी बेगलर ने अपने दस्तावेज में किया है. उन्होंने बिहार सरकार तथा जिला प्रशासन से यह आग्रह और निवेदन किया कि कुछ बाहरी षड्यंत्रकारी शक्तियों द्वारा हिंदू समाज को जातियों में तोड़ने और महाबोधि मंदिर तथा बोधगया की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करने के लिए मीडिया के माध्यम से गलत बातों का प्रचार कर समाज को भ्रम में डाला जा रहा है, जिससे आपसी सद्भावना खतरे में है. इस प्रकार के तथ्यहीन और भ्रामक बातें प्रचारित करने वाले लोगों पर कड़ी से कड़ी दंडात्मक कार्रवाई करने का भी उन्होंने आग्रह किया है. स्वामी विवेकानंद ने महाबोधि मंदिर मुक्ति आंदोलन करने वाले भिक्षुओं और लोगों से भी आग्रह किया कि वह ऐतिहासिक प्रमाणों का अध्ययन करें और आपसी भाईचारे और सद्भावना को बनाये रखें. उन्होंने आंदोलन करने वाले लोगों के लिए भी भगवान बुद्ध से प्रार्थना की कि उनको भी सद्बुद्धि दें और वे लोग भी भगवान बुद्ध के द्वारा दिये गये उपदेशों का पालन करते हुए अपने जीवन का उद्धार करें.

भगवान बुद्ध को विष्णु के नौंवे अवतार के रूप में पूजते हैं

बीटीएमसी में सभी सदस्य बौद्ध होने चाहिए, इस बात का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध को आराध्य मानने वाले बौद्ध संप्रदाय में भी हीनयान, महायान, वज्रयान शाखा के लोग भगवान बुद्ध और उनके उपदेशों को अपने-अपने तरीके से पालन करते हैं. इस प्रकार हिंदू भी भगवान बुद्ध को विष्णु के नौंवे अवतार के रूप में पूजते हैं, तो यह हिंदू और बौद्ध का प्रश्न नहीं उठता. उन्होंने कहा कि जिस प्रकार पूरी दुनिया में अपने-अपने देवी- देवताओं के प्रति श्रद्धा रखने वाले लोग ही समिति के सदस्य होते हैं, उसी प्रकार से बुद्ध मंदिर में भी भगवान बुद्ध को अपने आराध्य मानने वाले लोगों की ही समिति है. इसमें दूसरे कोई लोग नहीं है. पांच पांडव के मंदिरों के ऊपर पूछे गये प्रश्नों के जवाब में उन्होंने कहा कि हिंदू समाज कई सौ सालों से, जिसमें लिखित दस्तावेज के अनुसार 500 साल से उस मूर्ति को पांच पांडव की मूर्ति के रूप में पूजा करता है तथा हिंदू समाज की श्रद्धा और विश्वास का केंद्र है. किंतु कुछ बौद्ध भाइयों को अगर उस पांच पांडव के मूर्ति में भगवान बुद्ध का स्वरूप दिखता हो तो वह भगवान बुद्ध समझ कर ही उसकी पूजा करते हैं. इससे बोधगया मठ या हिंदू समाज को कोई आपत्ति नहीं है. मंदिर सदैव व्यक्ति की श्रद्धा पर केंद्रित होता है, जिनकी जैसी श्रद्धा और विश्वास हो उसके अनुरूप वह पूजा करें, किंतु आपस में विवाद न करें. महाबोधि मंदिर में सभी हिंदू सदस्यों को ब्राह्मण होने के दावों के प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा बीटीएमसी का गठन के समय से कोई भी सचिव ब्राह्मण नहीं रहा है. साथ ही साथ वर्तमान में कोई भी बीटीएमसी का सदस्य ब्राह्मण नहीं है व जहां तक बोधगया में महंत का प्रश्न है तो हम सभी जानते हैं कि संन्यासी किसी भी जाति वर्ग से नहीं होते. भारतवर्ष में हिंदू समाज चाहे वह किसी भी जाति का हो संन्यासी बन कर महंत बन सकता है. हिंदू मंदिर में बौद्धों को सदस्य के रूप में रखने के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध को मानने वाले सभी हमारे परिवार के सदस्य हैं. उनका हमारे हिंदू मंदिरों में भी स्वागत है. हम जिस प्रकार से भगवान राम, भगवान शिव, भगवान बुद्ध को अपना आराध्य मानते हैं, वह भी उसी प्रकार से आराध्य मानें. उनको भी हिंदू मंदिरों में सदस्य के रूप में सम्मिलित करने का हिंदू समाज विरोध नहीं करेगा. हम सभी को इस बात की खुशी ही होगी कि हमारे ही परिवार के सदस्य बौद्ध भाई भी हमारे मंदिर में सदस्य हैं. अंत में उन्होंने महाबोधि मुक्ति आंदोलन कर रहे सभी भिक्षुओं और लोगों से यह निवेदन किया कि आप सभी हमारे परिवार के सदस्य हैं. भगवान बुद्ध को अपना आराध्य मानने वाले हैं. आप सभी साथ में आकर महाबोधि मंदिर तथा बोधगया के विकास के लिए काम करें तो हम सभी के हित में होगा. उन्होंने भगवान बुद्ध से प्रार्थना भी की कि जो हमारे भाई गलत मार्ग पर हैं, उनको भी भगवान सद्बुद्धि दे ताकि वह भगवान बुद्ध के उपदेशों का अनुसरण करते हुए अपना जीवन सफल बना सकें.

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