Eid: सिर्फ गया में ही बनती है लखनऊ के नवाबों के सिर पर सजने वाली यह टोपी, पाकिस्तान से इंडोनेशिया तक होती है सप्लाई

Published by : Radheshyam Kushwaha Updated At : 22 Mar 2025 9:04 PM

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गया में पल्ले वाली टोपी बनाते हुए

Eid: लखनऊ के नवाबों के सिर पर सजने वाली पल्ले वाली टोपी सिर्फ गया में ही बनती है. पूरे देश सहित बांग्लादेश, पाकिस्तान व इंडोनशिया तक सप्लाई होती है.

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Eid: जितेंद्र मिश्रा/ गया. लखनऊ के नवाबों के सिर पर सजने वाली पल्ले वाली टोपी की मांग रमजान में काफी बढ़ जाती है. बता दें कि यह टोपी पूरे देश में सिर्फ गया में ही बनायी जाती है और यहीं से पूरे देश सहित बांग्लादेश, पाकिस्तान व इंडोनशिया तक सप्लाई होती है. टोपी पर कढ़ाई के लिए पहले लखनऊ भेजना पड़ता था. लेकिन, अब जिले के टनकुप्पा में इस टोपी पर कढ़ाई हो जाती है. रमजान के साथ यहां सालों भर इस टोपी की बिक्री होती है, पर रमजान में इसकी बिक्री में 60-70 प्रतिशत तक बढ़ जाती है. शहर में 20 से अधिक जगहों पर टोपी बनाने का काम सालों भर किया जाता है. इनमें बैंक रोड, धामी टोला, सराय मुहल्ला, कठोकर तालाब व नादरागंज मुख्य हैं. वहीं कढ़ाई का काम टनकुप्पा में किया जाता है.

फल्गु नदी का पानी कपड़े को साफ करने व अधिक सफेदी लाने में होता है प्रयोग

गया जिले में टोपियों के एक कारखाने से जुड़े मोहम्मद नेहाल अहमद ने बताया कि इस टोपी का निर्माण यहां आजादी से पहले से किया जा रहा है. फल्गु नदी का पानी कपड़ा को साफ करने व अधिक सफेदी लाने के लिए मशहूर है. इसके चलते यहां पर ही टोपियों का निर्माण किया जाता है. उन्होंने बताया कि पल्ले की टोपियां गया से कोलकाता जाती हैं और फिर वहां से बांग्लादेश और दिल्ली-मुंबई से पाकिस्तान और अन्य देशों में भेजी जाती हैं. इस बार रमजान में 15 करोड़ से अधिक का कारोबार होने की संभावना व्यक्त की जा रही है. नेहाल ने बताया कि होली में भी इस टोपी की मांग अधिक रहती है. इस काम से जुड़े आरिफ मोहम्मद ने बताया कि इस बार रमजान और ईद पर 60 से 70 लाख पल्ले वाली टोपियों की खपत होने की संभावना है. एक कारीगर यहां हर दिन 1200 टोपियों की सिलाई कर लेता हैं. पिछले पांच वर्षों में इस कारोबार में खासा उछाल आया है.

कैसी होती हैं ये टोपियां

पल्ले वाली टोपी में कपड़े के दो भाग कर उसकी सिलाई ऊपरी और साइड के हिस्से में की जाती है. ऊपरी हिस्से की सिलाई खोल दी जाये, तो ये दो हिस्से में हो जाता है. इसे सफेद सूती कपड़े से बनाया जाता है. टोपी बनाने वाले कपड़े को अध्धी कहा जाता है. टोपी की पट्टी पर सफेद धागे से गुल बूटे ”डिजाइन” बनाया जाता है. कढ़ाई युक्त पल्ले वाली टोपी लखनऊ के नवाब भी पहनते थे. टोपी बनाने में कम लागत पर मुनाफा अधिक होता है. कारोबारियों ने बताया कि एक प्लेन टोपी बनाने में आठ रुपये का खर्च पड़ता है. इसकी बिक्री थोक में 12-13 रुपये में हो जाती है. कढ़ाई वाली टोपी बनाने में 15-17 रुपये आता है. थोक में यह टोपी 22-25 रुपये में बिकती है. खुदरा दुकानों में यह टोपी 35 से 45 रुपये में बिक जाता है.

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Radheshyam Kushwaha

लेखक के बारे में

By Radheshyam Kushwaha

राधेश्याम कुशवाहा ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से MJ (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म) की शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत भोपाल से प्रकाशित राज एक्सप्रेस समाचार पत्र से की. इसके बाद उन्होंने समय जगत, राजस्थान पत्रिका और हिंदुस्तान जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं. वर्तमान में वे प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में धर्म, अध्यात्म एवं राशिफल डेस्क पर कार्यरत हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में 13 वर्षों का अनुभव रखने वाले राधेश्याम कुशवाहा को ज्योतिष शास्त्र, पंचांग गणना, ग्रह गोचर, नक्षत्र परिवर्तन, व्रत-त्योहारों की तिथियों तथा शुभ मुहूर्तों का गहन ज्ञान है. अपनी विशेषज्ञता के आधार पर वे धर्म-अध्यात्म और राशिफल से जुड़ी सटीक, तथ्यपरक एवं विश्वसनीय खबरें लिखते हैं. धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में उनकी विशेष रुचि है. इसके अलावा राजनीति, अपराध और प्रेरणादायक (पॉजिटिव) विषयों पर लेखन में भी उनकी गहरी रुचि है.

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