नहीं रहे उर्दू के मशहूर शायर शाहिद अहमद शोएब

Published at :03 Jun 2017 5:44 AM (IST)
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नहीं रहे उर्दू के मशहूर शायर शाहिद अहमद शोएब

मगध विश्वविद्यालय हार्वर्ड यूनिवर्सिटी व बिहार उर्दू अकादमी से भी जुड़े थे उर्दू साहित्यकार गया. उर्दू साहित्यकार शाहिद अहमद शोएब का निधन हो गया है. वह करीब 80 वर्ष के थे. शुक्रवार की सुबह करीब साढ़े छह बजे उन्होंने गया के एम्स अस्पताल में अंतिम सांस ली. वह शहर के कठोकर तालाब इलाके के रहनेवाले […]

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मगध विश्वविद्यालय हार्वर्ड यूनिवर्सिटी व बिहार उर्दू अकादमी से भी जुड़े थे उर्दू साहित्यकार
गया. उर्दू साहित्यकार शाहिद अहमद शोएब का निधन हो गया है. वह करीब 80 वर्ष के थे. शुक्रवार की सुबह करीब साढ़े छह बजे उन्होंने गया के एम्स अस्पताल में अंतिम सांस ली.
वह शहर के कठोकर तालाब इलाके के रहनेवाले थे. बीमार होने की वजह से चार दिन पहले उन्हें एम्स अस्पताल में भरती कराया गया था. पारिवारिक सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, वह अपने पीछे पत्नी व सात बेटे-बेटियों को छोड़ गये हैं. उल्लेखनीय है कि उनका परिवार मूलत: रांची के कर्बला चौक इलाके का बाशिंदा था. पर, 1964 में उनका परिवार गया आ पहुंचा. तब से अपने परिजनों के साथ लगातार वह यहीं रहते रहे. मिर्जा गालिब कॉलेज की गवर्निंग काउंसिल के अध्यक्ष रह चुके स्वर्गीय शोएब की मिट्टी-मंजिल के लिए शनिवार का दिन मुकर्रर किया गया है. उनके पुत्र शिब्तेन शाहिदी के मुताबिक, सुबह करीब साढ़े आठ बजे गया शहर के पंचायती अखाड़ा से आगे कर्बला के पास स्थित कब्रिस्तान डेविजन में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जायेगा.
उर्दू साहित्य में थी गहरी रुचि: स्वर्गीय शाहिद अहमद शोएब की उर्दू साहित्य में गहरी रुचि थी.मूलत: वह शायरी के प्रेमी थे. साहित्य रचना के अपने दौर में उन्होंने उर्दू में साहित्यिक सामंतवाद का अपने हिसाब से हर स्तर पर सामना किया था. इतना ही नहीं, उन्होंने उर्दू साहित्य में हिंदी शब्दों के उपयोग को भी बढ़ावा देने की काफी कोशिश की थी. उनके नज्मों के दो कलेक्शन ‘ले सांस भी आहिस्ता’ और ‘नाजुक है बहुत काम’ काफी चर्चा में रहे.
‘ले सांस भी आहिस्ता’ झारखंड के आदिवासी समाज की जीवन-शैली को प्रतिबिंबित करते नज्मों का संग्रह है. उर्दू साहित्य में उनकी गहरी पैठ व रचनात्मक सक्रियता को देखते हुए उन्हें बिहार उर्दू अकादमी के संचालन में भी दायित्व दिया गया था. वह अकादमी के उपाध्यक्ष रहे थे. उनके बेटे शिब्तेन शाहिदी के अनुसार, इससे पहले उनके पिता मगध विश्वविद्यालय में रीडर के पद पर रह कर काम कर चुके थे. मगध विश्वविद्यालय में सर्वे रिसर्च सेंटर के असिस्टेंट डायरेक्टर के पद पर भी काम कर चुके स्वर्गीय शोएब कुछ समय के लिए हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से भी जुड़े हुए थे. वह एंथ्रोपोलॉजी के बड़े विद्वान थे.
व्यक्तित्व पर था वामपंथी प्रभाव
स्वर्गीय शोएब के व्यक्तित्व पर वामपंथी धारा की छाप थी. उनकी रचनाओं के साथ ही दूसरे क्षेत्रों भी उनके क्रिया-कलाप पर वामपंथ की छाया दिखती थी. माना जाता है कि वह मार्क्सवाद के प्रभाव में आगे बढ़े साहित्यकार-रचनाकार थे. वह हमेशा समाज के शोषित-वंचित व उपेक्षित वर्ग के लिए खड़े होने का प्रयास करते रहे.
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