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‘उस अादमी काे देखें, जाे सड़क के…’रेनेसांस में कवियों ने सामाजिक संवेदना, महिला सशक्तीकरण, उत्पीड़न, शाेषण, मुक्ति व राजनीतिक विषयाें पर डाला प्रकाशफाेटाे-मुख्य संवाददाता, गया‘उस अादमी काे देखें, जाे सड़क के उस पार जाना चाहता है. मुझे उम्मीद है कि दुनिया जाे इस तरफ है, शायद उससे बेहतर हाेगी सड़क के उस तरफ…’ व्यक्ति के […]

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‘उस अादमी काे देखें, जाे सड़क के…’रेनेसांस में कवियों ने सामाजिक संवेदना, महिला सशक्तीकरण, उत्पीड़न, शाेषण, मुक्ति व राजनीतिक विषयाें पर डाला प्रकाशफाेटाे-मुख्य संवाददाता, गया‘उस अादमी काे देखें, जाे सड़क के उस पार जाना चाहता है. मुझे उम्मीद है कि दुनिया जाे इस तरफ है, शायद उससे बेहतर हाेगी सड़क के उस तरफ…’ व्यक्ति के जीवनचक्र काे छूती इस कविता का पाठ देश के नामचीन कवि ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित केदारनाथ सिंह ने बुधवार की शाम रेनेसांस के थियेटर में श्राेताआें व दर्शकाें से खचाखच भरे हॉल में सुनाया, ताे तालियां गूंज उठीं. काव्य पाठ की कड़ी में उन्हाेंने ‘कपास के फूल’ कविता के माध्यम से बताया कि जाे दूसराें काे गरमी देता है, भले ही वह देवता काे पसंद नहीं, पर उसे बनाया ताे ईश्वर ने ही है. उनकी कविताआें में भिखारी ठाकुर व बनारस पर केंद्रित कविता का पाठ लाेगाें काे खूब भाया. ये दाेनाें कविताएं उन्हाेंने श्राेताआें की डिमांड पर सुनायीं. केदारनाथ सिंह ने चर्चा के दाैरान बताया कि वह गया तीसरी बार आये हैं. पहली बार जब वह छात्र थे, करीब 50 साल पहले. इस बार वह काेलकाता जा रहे थे. संजय सहाय के आमंत्रण पर आ गये. उन्हाेंने बताया कि जब वह जेएनयू में प्राेफेसर थे, तब मगध यूनिवर्सिटी से भी अॉफर मिला था. बुद्ध व विष्णु की नगरी में आकर बड़ा सुखद अनुभव हुआ. उन्हाेंने कहा कविता केवल चाहरदीवाराें के बीच पढ़ी जाये, यह उसके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं. कविता वह है, जाे आपके अंदर स्वत: आ जाये. जाे कह नहीं सकते, वही कविता है. कागज से उठ कर जिंदा हाे जाये, वही कविता है. इसमें आलाेक धन्वा ने महारत हासिल की है.आज हिंसा हमारी चुनाैती है : आलाेक धन्वाआलाेक धन्वा पहली बार गया पहुंचे. उन्हाेंने अपनी कई रचनाएं सुनायीं व मार्क्सवाद व समाजवाद पर काफी चर्चाएं कीं. उन्हाेंने पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर व पूर्व सांसद दयानंद सहाय के परिवार के साथ अपना पुराना रिश्ता बताया. गया के प्रख्यात समालाेचक सुरेंद्र चाैधरी काे अपना गुरु व बुद्ध काे आदिगुरु बताया. उन्होंने कहा कि दुनिया में कहीं भी एक बच्चा दुखी है, उसके आंखाें में आंसू है, ताे समझिए वहां सरकार व सुख नहीं है. उन्हाेंने कहा मजदूर व किसान हिंसा नहीं करते, हिंसा ताे शासक करता है. अपराध, लूट व क्रूरता की दुनिया ऐसी है, जाे चाहे-अनचाहे हर किसी काे अपनी जद में ले लेता है. आज हमारी चुनाैती हिंसा है. आलाेक धन्वा ने ‘आम का पेड़’, ‘नदियां’, ‘पतंग’, ‘भागी हुई लड़की’ शीर्षक से कई कविताआें का पाठ किया. उन्हाेंने बताया कि ‘भागी हुई लड़की’ की रचना में उन्हें सात साल लगे. इस कविता का पाठ करते हुए कहा, घर की जंजीरे कितनी ज्यादा दिखायी पड़ती हैं, जब घर से काेई लड़की भागती है… दूसरी कविता ‘पतंग’ में उनके रग से ही फूटते हैं. ‘पतंग के धागे’ खूब पसंद किये गये.नाटक सत्याग्रह का मंचनकविद्वय के काव्य पाठ के बाद ‘सत्याग्रह’ नामक नाटक का मंचन किया गया. इसमें स्थानी कलाकार राजेश अवस्थी, अभिषेक मिश्र, मनु मणि, प्रतिभा, विवेक, शशिभूषण व शुभमजीत आदि ने अभिनय किया. उनके अभिनय काे खूब सराहा गया. कविता पाठ के दाैरान चर्चित सांस्कृितक पत्रकार सह दृश्यांतर के संपादक अजीत राय ने मंच संचालन किया. अनिश अंकुर की पुस्तक का विमाेचन किया गया. इस माैके पर दर्शकाें में डीआइजी रत्न संजय, एसएसपी गरिमा मलिक, इनकम टैक्स के सहायक आयुक्त साैरभ राय, सीयूएसबी के प्राेफेसर कमलाकांत झा, कथाकार शैवाल व अन्य माैजूद थे.

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