बिहार में फ्यूल कॉस्ट पर 49 पैसे प्रति यूनिट बिजली दर बढ़ाने की मांग नामंजूर, जानें विनियामक आयोग ने क्या कहा

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बिजली कंपनी ने दावा किया था कि पिछले वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में इन इकाइयों से उनको पीपीए से अधिक शुल्क पर बिजली मिली. शुल्क बढ़ने के पीछे फ्यूल यानी कोयले की दर बढ़ने की बात कही गयी.

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बिहार विद्युत विनियामक आयोग ने फ्यूल एंड पावर परचेज कॉस्ट एडजस्टमेंट (एफपीपीसीए) शुल्क के नाम पर 49 पैसे प्रति यूनिट बिजली दर बढ़ाने के बिजली कंपनी के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया है. होल्डिंग कंपनी ने इसको लेकर आयोग में याचिका दायर की थी, जिस पर सभी हितधारकों की सुनवाई के बाद आयोग के अध्यक्ष शिशिर सिन्हा और सदस्य एससी चौरसिया की बेंच ने यह निर्णय दिया है. सुनवाई में आयोग ने माना कि कंपनी से एफपीपीसीए शुल्क की गणना करने में चूक हुई है.

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10 पैसे प्रति यूनिट से कम का ही हो सकता है अंतर

आयोग ने कहा कि कंपनी ने वित्त वर्ष 2022-23 के पहले छह महीने में हुई बिजली खरीद में तय दर से औसतन 49 पैसे प्रति यूनिट अधिक शुल्क लगने का दावा किया है. याचिकाकर्ता के मुताबिक सितंबर 2022 में समाप्त छमाही में विभिन्न स्त्रोतों से कुल 23629.60 एमयू बिजली 5.19 रुपये प्रति यूनिट की औसत दर से खरीदी गयी. मगर स्वीकृत 15 फीसदी बिजली वितरण हानि, 2.47 फीसदी केंद्रीय ट्रांसमिशन हानि और तय 5.12 रुपये प्रति यूनिट बिजली खरीद दर की गणना करने पर बिजली खरीद की दर 10 पैसे प्रति यूनिट से अधिक नहीं होती. नियमों के मुताबिक एफपीपीसीए तभी चार्ज किया जा सकता है, जब प्रति यूनिट राशि 10 पैसे प्रति यूनिट प्रति माह से अधिक हो. इसलिए आयोग संचयी रूप से एफपीपीसीए शुल्क वसूल करने की अनुमति देने का आदेश पारित करना उचित नहीं समझता है.

ऊर्जा शुल्क बढ़ने के नाम पर दावा

दरअसल बिजली कंपनियां बिजली उत्पादन करने वाली इकाइयों से लंबी अवधि का पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) करती है. बिजली कंपनी ने दावा किया था कि पिछले वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में इन इकाइयों से उनको पीपीए से अधिक शुल्क पर बिजली मिली. शुल्क बढ़ने के पीछे फ्यूल यानी कोयले की दर बढ़ने की बात कही गयी. इसके पक्ष में आंकड़े भी पेश किये गये.

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