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Darbhanga News: भारतीय ज्ञान-परंपरा का मूल स्रोत है वेद

Updated at : 11 Dec 2025 10:22 PM (IST)
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Darbhanga News: भारतीय ज्ञान-परंपरा का मूल स्रोत है वेद

Darbhanga News:अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. पांडेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान-परंपरा का मूल स्रोत वेद है.

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Darbhanga News: दरभंगा. कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर दर्शन विभाग तथा महर्षि सांदीपनि वेद विद्यापीठ की ओर से “वैदिक मन्त्राणां दार्शनिकम् विश्लेषणम्” विषयक तीन दिवसीय अखिल भारतीय वैदिक संगोष्ठी दरबार हॉल में गुरुवार को शुरू हुई. उद्घाटन कुलपति प्रो. लक्ष्मी निवास पांडेय आदि ने दीप जलाकर किया. अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. पांडेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान-परंपरा का मूल स्रोत वेद है. वेद अपौरुषेय है. इतना विस्तृत ग्रन्थ होने पर भी व्यासजी ने अपना नाम नहीं देकर अद्वितीय निःस्वार्थ परंपरा का उदाहरण रखा. पुरुष सूक्त में वर्णित विराट पुरुष को आज के 140 करोड़ भारतीयों के ‘राष्ट्रपुरुष’ के रूप में समझने की बात कही. कहा कि प्राचीनकाल में वेदाध्ययन एवं शास्त्रार्थ में स्त्रियों की उपस्थिति मिलती है. इसका उल्लेख अनेक वैदिक साहित्य में है. संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने कहा कि मिथिला का वर्णन वेदकाल से ही मिलता है. गार्गी जैसी विदुषी ने यहीं शास्त्रार्थ की थी. गौतम, अष्टावक्र आदि मनीषियों का इस भूमि से संबंध होने का उल्लेख किया.

सूक्त में संपूर्ण समाज की समन्वित संरचना का संकेत- प्रो. शर्मा

मुख्य अतिथि सह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्मविज्ञान संकाय के पूर्व संकायाध्यक्ष प्रो. कृष्णकांत शर्मा ने कहा कि श्रुति स्मृति विरोध की स्थिति में श्रुति को प्रामाणिक माना जाता है. वेद के चार विभागों मंत्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया. पुरुष सूक्त के दार्शनिक महत्व की व्याख्या की. कहा कि सूक्त में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं, अपितु संपूर्ण समाज की समन्वित संरचना का संकेत है. पूर्व कुलपति प्रो. उमेश शर्मा ने ‘वेद’ शब्द की व्युत्पत्ति, वेदांत तथा व्याकरण की वैदिक परंपरा में श्रेष्ठता पर प्रकाश डाला. मन्त्रार्थ, सिद्धि-प्रक्रिया और अद्वैत-दृष्टि के मूल तत्वों की व्याख्या की. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वेद विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. उपेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि समस्त पदार्थों में ईश्वर-दृष्टि ही वेद का मुख्य उपदेश है. अतिथियों का स्वागत कुलसचिव प्रो. ब्रजेशपति त्रिपाठी, विषय-प्रवर्तन डॉ धीरज कुमार पांडेय, संचालन डॉ साधना शर्मा तथा धन्यवाद-ज्ञापन डॉ सुधीर कुमार ने किया.

वैदिक साहित्य, दर्शन एवं तत्त्व मीमांसा के विविध आयामों पर व्याख्यान

पीआरओ निशिकांत सिंह के अनुसार कार्यक्रम दो सत्रों में हुआ. द्वितीय सत्र की अध्यक्षता संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के पूर्व कुलपति प्रो. रामकिशोर मिश्र ने की. इस सत्र में पूर्व कुलपति प्रो. उपेंद्र झा तथा प्रो. शशिनाथ झा ने वैदिक साहित्य, दर्शन एवं तत्त्व मीमांसा के विविध आयामों पर व्याख्यान प्रस्तुत किए. साहित्य विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. लक्ष्मीनाथ झा ने वैदिक व्याकरण और मंत्रार्थ की विश्लेषणात्मक प्रस्तुति दी. संचालन डॉ. सविता आर्या तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ संतोष तिवारी ने किया. कार्यक्रम में समन्वयक डॉ शंभू शरण तिवारी, डॉ माया कुमारी, डॉ निशा कुमारी, डॉ संतोष तिवारी, डॉ रितेश कुमार चतुर्वेदी, प्रो. दयानाथ झा, डॉ पवन कुमार झा, प्रो. दिलीप कुमार झा आदि मौजूद थे.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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