Darbhanga:मिथिला की धरती कर्मकांडीय परंपरा, तर्क परंपरा एवं वाद-विवाद परंपरा की जननी

Edited by RANJEET THAKUR
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संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ कृष्णकांत झा ने अयाची मिश्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला.

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दरभंगा. लनामिवि के पीजी दर्शनशास्त्र विभाग एवं डॉ प्रभात दास फाउंडेशन की ओर से दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ शिवानंद झा की अध्यक्षता में “भारतीय ज्ञान परंपरा की पृष्ठभूमि में पंडित अयाची मिश्र के दार्शनिक विचारों की प्रासंगिकता ” विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया. मुख्य वक्ता सह रामेश्वर सिंह कालेज मुजफ्फरपुर के प्रधानाचार्य प्रो. श्यामल किशोर ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा तब तक पूर्ण नहीं हो सकती, जब तक हम मिथिला ज्ञान परंपरा की समझ विकसित नहीं कर लेते. इस क्रम में मंडन मिश्र, अयाची मिश्र, वाचस्पति मिश्र, उदयानार्च जैसे विचारकों का नाम अग्रणी रूप से आता है. उन्होंने मिथिला की धरती को कर्मकांडीय परंपरा, तर्क- परंपरा, वाद-विवाद परंपरा की जननी बताया.

अयाची मिश्र का विचार मिथिला का सांस्कृतिक एवं दार्शनिक धरोहर

पीजी दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ शिवानंद झा ने पंडित अयाची मिश्र की कृतियों एवं उनके विचारों को मिथिला का सांस्कृतिक एवं दार्शनिक धरोहर बताया. इससे पूर्व विषय प्रवेश कराते हुए डॉ राजीव कुमार ने भारतीय ज्ञान परंपरा के बीज तत्वों से छात्र- छात्राओं को परिचित कराया. पंडित अयाची मिश्र के योगदान की चर्चा की. संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ कृष्णकांत झा ने अयाची मिश्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला. कहा कि भवनाथ मिश्र से अयाची मिश्र तक की यात्रा बड़ी ही रोचक रही. मिथिला की दार्शनिक परंपरा एवं टोल पाठशाला पर भी विचार रखा. धन्यवाद ज्ञापन डॉ संजीव कुमार शाह ने किया. मौके पर सब डॉ शालिनी रानी दास, डॉ कृष्णा, डॉ सोनी शर्मा, डॉ प्रिया नंदन, डॉ सुकृति, डॉ ममता स्नेही, डॉ लक्ष्मी कुमारी आदि मौजूद थे.

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