Darbhanga News: ऋग्वेद का पुरुष सूक्त दार्शनिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में अत्यंत महत्वपूर्ण

Edited by PRABHAT KUMAR
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Darbhanga News:ऋग्वेद का पुरुष सूक्त दार्शनिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में अत्यंत ही महत्वपूर्ण एवं वेदों का सार तत्व है.

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Darbhanga News: दरभंगा. ऋग्वेद का पुरुष सूक्त दार्शनिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में अत्यंत ही महत्वपूर्ण एवं वेदों का सार तत्व है. यह पुरुष ही परमपुरुष, आदिपुरुष, परब्रह्म या परमेश्वर है, जो माया- मोह तथा लोभ-भय आदि से मुक्त निर्लिप्त भाव से सर्वत्र व्याप्त है. यह अधिकांश दर्शनों एवं कई वैज्ञानिक सिद्धांतों का आधार है. यह परम पुरुष मोक्ष दाता है, जो सबके हृदय में वास करता है. यह बातें कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व वेद विभागाध्यक्ष डॉ विनय कुमार मिश्र ने कही. वे शनिवार को लनामिवि के पीजी संस्कृत विभाग तथा डॉ प्रभात दास फाउंडेशन की ओर से आयोजित “पुरुष सूक्त: दर्शन और विज्ञान ” विषयक राष्ट्रीय सेमिनार में बोल रहे थे. कहा कि पुरुषसूक्त से प्रेरणा पाकर ही कपिल ने शांख्यदर्शन का प्रणयन किया. पुरुष शांत भाव से रहता है, पर उसकी उपस्थिति मात्र से ही ऊर्जा का संचार होता है. डॉ मिश्र ने ब्रह्मांड की उत्पत्ति के निर्मित्त, उपादान एवं सामान्य कारणों को बताते हुए कहा कि प्रकृति उपादान कारण, परमात्मा निमित्त कारण तथा अन्य सभी साधन सामान्य कारण हैं.

वेद के हर मंत्र में विज्ञान- मुकेश

डॉ प्रभात दास फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा ने कहा कि वेद के हर मंत्र में विज्ञान है. ईश्वर सजीव एवं निर्जीव सभी में और सर्वत्र व्याप्त है. पुरुष सूक्त में 15 ऋचाएं अनुष्टुप एवं 16 वां ऋचा त्रिष्टुप छन्द में है.

यज्ञानुष्ठान एक शोध- डॉ सुनील

भूगोल विभाग के शिक्षक डॉ सुनील कुमार सिंह ने कहा कि हम लोग मात्र 25 प्रतिशत ही ब्रह्मांड को देख पाते हैं. संस्कृत साहित्य में विज्ञान का अत्यधिक प्रयोग हुआ है. यज्ञानुष्ठान एक शोध ही है. संस्कृत और विज्ञान के संगम से प्राचीन विज्ञान का स्वरूप प्रकट होगा. संस्कृत को परफेक्ट विषय बताते हुए कहा कि इसमें वर्णित ज्ञान- विज्ञान को डिकोड करने की जरूरत है.

पुरुष सूक्त दर्शन और विज्ञान का अद्भुत उदाहरण- डॉ चौरसिया

विषय प्रवेश करते हुए संयोजक डॉ आरएन चौरसिया ने कहा कि पुरुष सूक्त दर्शन और विज्ञान का अद्भुत उदाहरण है, जो ऋग्वेद का एक अत्यंत पवित्र, प्रसिद्ध, दार्शनिक एवं गूढ़ वैदिक अंश है. इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्मांडीय चेतना, समाज- रचना, यज्ञ की महिमा तथा परम पुरुष के वैभव का वर्णन है. इसका आध्यात्मिक, वैज्ञानिक सांस्कृतिक एवं दार्शनिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व है.

पुरुष सूक्त के 16 मंत्र गागर में सागर जैसे- डॉ घनश्याम

विभागाध्यक्ष डॉ घनश्याम महतो ने कहा कि पुरुष सूक्त के 16 मंत्र गागर में सागर जैसे हैं, जो सदा अमूल्य एवं अध्ययन-अध्यापन के योग्य हैं. ज्ञान के दो रूप हैं- दर्शन जो तर्क-वितर्क के योग्य आंतरिक हैं तथा विज्ञान जो प्रयोगात्मक एवं बाह्य रूप में हैं. कहा कि पुरुष सूक्त के अनुसार चारों वर्णों की उत्पत्ति का स्रोत परम पुरुष ही है, इसलिए सभी समान रूप से पूज्य एवं अनिवार्य हैं. सेमिनार में महेन्द्र लाल दास, प्रेरणा नारायण, डॉ सुजय पाण्डे, सोनू कुमार और सुयश प्रत्यूष आदि ने भी विचार रखा. संचालन नीतू कुमारी, स्वागत डॉ ममता स्नेही तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ मोना शर्मा ने किया. सेमिनार में दीपाली आर्या, डॉ अशोक कुमार, डॉ मंजरी खरे, विनोदानंद झा, डॉ सुनीता कुमारी, डॉ संजीव कुमार साह, डॉ प्रियंका राय, डॉ रश्मि शिखा, डॉ प्रेम कुमारी आदि मौजूद थे.

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