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पानी के जार पर न पैकिंग का डेट, न लिखा रहता कितने दिन तक कर सकते पानी का उपयोग

Updated at : 23 May 2024 10:58 PM (IST)
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Darbhanga News :

अधिकांश इलाके में भू-जल प्रदूषित हो जाने तथा पेयजल आपूर्ति का सरकारी सिस्टम सही से काम नहीं करने के कारण जिले में पेयजल का धंधा खूब फलफूल रहा है.

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राजकुमार रंजन, दरभंगा. अधिकांश इलाके में भू-जल प्रदूषित हो जाने तथा पेयजल आपूर्ति का सरकारी सिस्टम सही से काम नहीं करने के कारण जिले में पेयजल का धंधा खूब फलफूल रहा है. डिब्बा बंद पानी प्रतिदिन छोटे-छोटे वाहनों से हजारों घरों, व्यवसायिक स्थलों, दफ्तरों, संस्थाओं, प्रतिष्ठानों तक पहुंचाया जाता है. कई कारोबारी सीधे बोरिंग का पानी जार (डब्बा) में भरकर बेच दे रहे हैं. जार पर न तो पैकिंग का डेट और न ही कितने दिन तक पानी उपयोग करने लायक है, यह लिखा जाता है. पानी का कारोबार प्रारंभ करने से पहले पांच सरकारी विभाग से लाइसेंस जरूरी है. नगर में जिन विभागों से अनुमति अनिवार्य है, उनमें बीआइएस, पीएचइडी, उद्योग विभाग, नगर निगम, खाद्य जांच एजेंसी शामिल है. शहर से लेकर गांवों तक फैले इस कुटीर उद्योग के संचालक लाइसेंस के चक्कर में नहीं पड़, सीधे कारोबार कर रहे हैं. सरकारी स्तर से पेयजल आपूर्ति प्लांट की जांच नहीं की जाती है. लोगों की जेब ही नहीं सेहत के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है. जानकारों की मानें तो 90 फीसदी जार के पानी में प्लास्टिक के कण व सूक्ष्म जीव होते हैं. अधिकांश कारोबारियों के यहां पानी की गुणवत्ता जांच का कोई सिस्टम नहीं होता. उपयोग जानकारों के अनुसार जार में पानी सप्लाई करने का प्रतिदिन का कारोबार लाखों में है. खरीदारों को पानी के एवज में पक्की रसीद नहीं दी जाती है. टीडीएस नहीं लिया जाता. इससे सरकार को राजस्व की क्षति होती है. उपभोक्ताओं से प्रति जार 25 से 30 रुपये लिया जाता है. कई उपभोक्ताओं का कहना है कि लाचारी में वे लोग पानी खरीद रहे हैं. लंबे समय से सफाई नहीं होने के कारण जार के मुंह पर गंदगी बैठ जाती है.पैंकिंग से पूर्व जार को कीटाणुमुक्त करने का सिस्टम कारोबारियों के पास नहीं होने की बात कही जा रही है. ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआइएस) ने ड्रिंकिंग वॉटर और पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर के लिए मानक तय कर रखा है. पानी में टीडीएस की मात्रा जीरो से 500 पार्ट्स प्रति मिलियन (पीपीएम) होनी चाहिए. पीएच लेवल 6.5 से 7.5 होना चाहिए. वाटर प्लांट लगाने के लिए 1500 वर्ग फीट का प्लांट जरूरी है. प्लांट में साफ- सफाई के साथ यूवी ट्रीटमेंट, माइक्रोन, गार्नेट फिल्टर, ओजोनाइजेशन जरूरी है. कर्मचारी साफ कपड़े के साथ हाथ में ग्लव्स, सिर पर कवर कैप, पैर में प्लास्टिक का जूता पहनेंगे. डॉ एनपी वर्मा, डॉ केके सिंह, डॉ अलका आदि ने बताया कि डब्बा बंद पानी में सेहत की सुरक्षा के मानकों का ख्याल रखा जाना चाहिए. वर्तमान में जार के माध्यम से जो पेयजल की आपूर्ति की जा रही है, उसका अधिकांश प्लांट मापदंड का पालन नहीं कर रहा है. उपभोक्ताओं को मापदंड की लिखित जानकारी भी नहीं दिया जा रहा है. कार्यपालक अभियंता पीएचइडी दिलीप कुमार चौधरी ने बताया कि निजी स्तर पर डिब्बा बंद (जार) पेयजल आपूर्ति करने वाला प्लांट विभाग से संचालित नहीं है. न ही वाटर प्लांट से निकलने वाले पेयजल की जांच का अधिकार पीएचइडी को है. विभाग किसी भी प्लांट से निकलने वाली पेयजल की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा नहीं कर सकता. कोई व्यक्तिगत रूप से पीएचइडी के लैबोरेट्री में पानी का नमूना उपलब्ध कराता है, तब गुणवत्ता की जांच कर रिपोर्ट उपलब्ध करायी जा सकती है. जिले के वरीय पदाधिकारी के निर्देश पर ही लेबोरेटरी में जांच संभव है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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