वासुदेव ने अरवा चावल का प्लांट लगा बदली शीतलपुर की किस्मत

Updated at : 24 Jul 2016 7:17 AM (IST)
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वासुदेव ने अरवा चावल का प्लांट लगा बदली शीतलपुर की किस्मत

अजीत रक्सौल : चावल प्लांट (सेलर मशीन) बनानेवालों के बीच वासुदेव शर्मा अनजान नाम नहीं है. रक्सौल के पास शीतलपुर गांव के रहनेवाले वासुदेव के एक कदम से पूरे गांव की तकदीर और तसवीर बदल गयी. अब उनके गांव को सेलर प्लांट के नाम से जाना जाता है. गरीब परिवार से निकले वासुदेव 1962 में […]

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अजीत

रक्सौल : चावल प्लांट (सेलर मशीन) बनानेवालों के बीच वासुदेव शर्मा अनजान नाम नहीं है. रक्सौल के पास शीतलपुर गांव के रहनेवाले वासुदेव के एक कदम से पूरे गांव की तकदीर और तसवीर बदल गयी.

अब उनके गांव को सेलर प्लांट के नाम से जाना जाता है. गरीब परिवार से निकले वासुदेव 1962 में शीतलपुर गांव की संपत्ति बेंच कर नेपाल मजदूरी करने चले गये थे. मजदूर के तौर पर नेपाल में चावल बनानेवाले प्लांट के जापानी इंजीनियर के साथ काम किया और जब चावल प्लांट बनाने में पारंगत हो गये थे, तो 1981 में फिर से अपने गांव लौट आये और यहीं पर उन्होंने चावल प्लांट लगाया, तब तक अपने यहां धान कूटने की मशीन से चावल निकाला जाता था, लेकिन वासुदेव की मानें, तो उन्होंने देश का पहला अरवा चावल कूटनेवाला प्लांट लगाया. वासुदेव बताते हैं कि लगभग उसी समय मुंबई की कंपनी डाडेका ने उसना चावल कूटने का प्लांट बनाया था, लेकिन शर्मा का सेलर प्लांट की मांग देश के विभिन्न भागों में होने लगी. देश के साथ बांग्लादेश भी सेलर मशीन जाने लगी.

वासुदेव की तरक्की को देख कर गांव के अन्य लोगों ने सेलर मशीन बनाने का कारखाना लगाना शुरू किया. हालत यह है कि अब शीतलपुर व आसपास के गांवों में 70 सेलर प्लांट लग चुके हैं, जिनका टर्न ओवर साल में करोड़ों में हैं. यहां के लोगों की सुबह हथौड़ी की आवाज के बीच होती है और रात में सोते समय भी किसी न किसी प्लांट में काम होता रहता है.

कैसे बनाया सेलर : वासुदेव शर्मा ने नेपाल के नारायणघाट में डीजल इंजन की लेथ मशीन में रामलखन मिस्त्री के हेल्पर के रूप में बाल मजदूर के रूप में काम किया. इसी दौरान जापान की कंपनी सटाके ने उच्च तकनीक का सेलर प्लांट बनाया.

लेथ के मालिक चामू नारायण प्रधान ने ही सटाके कंपनी की एंजेसी ले रखी थी, जहां से पूरे नेपाल में सेलर भेजा जाता था. मशीन में खराबी आने पर सटाके कंपनी के इंजीनियर जापान से आते थे और मशीन को ठीक करते थे. इस दौरान वासुदेव का ध्यान इंजीनियर द्वारा किये जा रहे काम पर होता था. वे सेलर के बारे में बारीक जानकारी रखने लगे. वासुदेव बताते हैं कि उस समय जापानी इंजीनियरों के दल में बंगाल के रहनेवाले वाणी भट्टाचार्य भी शामिल थे.

वासुदेव की लगन देख कर इंजीनियर वाणी भट्टाचार्य ने सेलर मशीन के बारे में जानकारी देनी शुरू की. वे चाहते थे कि छोटी समस्या हो, तो वासुदेव खुद ही उसे ठीक कर दें. जापान से इंजीनियरों को नहीं आना पड़े. वासुदेव की लगन देख कर एजेंसी के मालिक ने भी उन्हें प्रोत्साहित किया. कुछ दिनों में वासुदेव ने खुद ही लेथ मशीन से सेलर प्लांट बना डाला, लेकिन इसी बीच एक अनहोनी हुई. एजेंसी के मालिक की पत्नी का निधन हो गया, जिससे उनकी एजेंसी बंद हो गयी और वासुदेव बेरोजगार हो गये.

सेलर मिल व उसकी ख्याति : बेरोजगारी के बीच 1981 में शर्मा अपने गांव शीतलपुर पहुंचे और दिल्ली से एक लेथ मशीन खरीद कर लाये. उसके सहारे वासुदेव ने सेलर मशीन बनाना शुरू किया. शुरू में मशीन के खरीदार नहीं मिल रहे थे, क्योंकि किसी को उस पर विश्वास नहीं हो रहा था.

इसी बीच कैमूर भभुआ के रहनेवाले अमरदेव सिंह ने पहली मशीन खरीदी, लेकिन अविश्वास के साथ. जब मशीन को चाल कर देखा, तो चकित रह गये. इसके बाद उन्होंने लोगों से मशीन के बारे में बताना शुरू किया, तो ग्राहक आने शुरू हो गयी. धीरे-धीरे तो वासुदेव को इतना काम मिलने लगा कि वो सप्लाई नहीं कर पा रहे थे. आज स्थिति ये है कि अकेले शीतलपुर गांव में 50 सेलर प्लांट हैं. अब यहां एक से लेकर 25 लाख तक की सेलर मशीन बनती है.

सरकार का प्रयास

21 अप्रैल 2012 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शीतलपुर गांव पहुंचे थे, उन्होंने सेलर व्यवसायियों का कलस्टर बनाने की बात कही थी, जिसके बाद एनआइटी के प्रोफेसर व छात्रों की टीम ने यहां का दौरा किया और सेलर को लेकर अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें कहा गया कि हथौड़ी से बनानेवाले सेलर में फिनिशिंग अच्छी नहीं आती है.

अगर सब सेलर बनानेवाले एक हो, तो 12 करोड़ की लागतवाली मशीन से सेलर बनाने का काम हो. इससे फिनिशिंग ठीक होगी और लागत भी कम आयेगी, क्योंकि अभी मजदूरों से काम होता है, जिसमें समय से साथ मजदूरी भी ज्यादा लगती है, लेकिन इस पर व्यवसायी सहमत नहीं हुये और योजना खटाई में पड़ गयी.

अब सेलर व्यापारियों को बिजली पर सब्सिडी देने की बात हो रही है. इस पर कुछ काम हुआ है, लेकिन अभी तक इसे लागू नहीं किया जा सका है. यहां जाता है सेलर बिहार, बंगाल, आसाम, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र व उत्तर प्रदेश.

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