अखंड सौभाग्य का प्रतीक है करवा चौथ : प्रेमाचार्य पीतांबर

हमारी भारतीय संस्कृति में करवा चौथ त्योहार का विशेष महत्त्व है. व्रत का विशेष विधान है. सभी विवाहित स्त्रियां साल भर इस त्योहार का इंतजार करती हैं.
करवा चौथ की पूजन विधि : करवा चौथ का व्रत रखने वाली स्त्री सुबह नित्यकर्मों से निवृत्त होकर, स्नान आदि करके, आचमन के बाद संकल्प लेकर यह कहे कि मैं अपने सौभाग्य एवं पुत्र-पौत्रादि तथा निश्चल संपत्ति की प्राप्ति के लिए करवा चौथ का व्रत करूंगी. यह व्रत निराहार ही नहीं, अपितु निर्जला के रूप में करना अधिक फलप्रद माना जाता है. इस व्रत में शिव-पार्वती, कार्तिकेय और गौरा का पूजन करने का विधान है.चंद्रमा, शिव, पार्वती, स्वामी कार्तिकेय और गौरा की मूर्तियों की पूजा षोडशोपचार विधि से विधिवत करके एक तांबे या मिट्टी के पात्र में चावल, उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री, जैसे- सिंदूर, चूडियां शीशा, कंघी, रिबन और रुपया रखकर किसी बड़ी सुहागिन स्त्री या अपनी सास के पांव छूकर उन्हें भेंट करनी चाहिए.
सायं बेला पर पुरोहित से कथा सुनें, दान-दक्षिणा दें. रात्रि में जब पूर्ण चंद्रोदय हो जाए तब चंद्रमा को चलनी से देखकर अर्घ्य दें. आरती उतारें और अपने पति का दर्शन करते हुए पूजा करें. इससे पति की उम्र लंबी होती है. तत्पश्चात पति के हाथ से पानी पीकर व्रत तोड़ें. ॐ शिवायै नमः से पार्वती का, ॐ नमः शिवाय से शिव का, ॐ षण्मुखाय नमः से स्वामी कार्तिकेय का, ॐ गणेशाय नमः से गणेश का तथा ॐ सोमाय नमः से चंद्रमा का पूजन करें. लड्डू का नैवेद्य रखकर नैवेद्य अर्पित करें. एक लोटा, एक वस्त्र व एक विशेष करवा दक्षिणा के रूप में अर्पित कर पूजन समापन करें. करवा चौथ व्रत की कथा पढ़ें अथवा सुनें. लेकिन इस बार करवा चौथ पर भद्रा दोष की वजह से नव विवाहिताओं के लिए इस व्रत का शुभारंभ निषेध है. ऐसी स्थिति में लड्डू गोपाल को स्नान करवा कर चरणामृत होठों से स्पर्श करवा कर व्रत आरंभ करने से भद्रा दोष समाप्त हो जायेगा. भद्रा काल की निवृत्ति के लिए ये बारह नाम लेना न भूलें- थान्या, दधिमुखी, भद्रा, महामारी, खरानना, कालरात्रि, महारूद्रा, विष्टि, कुलपुत्रिका, भैरवी, महाकाली और असुरक्षयकारी.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
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