Buxar News: श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन का जागृत दृश्य देख भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

Published by : RAVIRANJAN KUMAR SINGH Updated At : 08 Apr 2025 5:53 PM

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मपुर में चल रहे श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में वृंदावन की रासलीला मंडली के द्वारा जारी श्रीकृष्ण की लीलाओं के माध्यम से बताया जा रहा है कि भगवान श्रीकृष्ण लीलावतार हैं.

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चौसा

. रामपुर में चल रहे श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में वृंदावन की रासलीला मंडली के द्वारा जारी श्रीकृष्ण की लीलाओं के माध्यम से बताया जा रहा है कि भगवान श्रीकृष्ण लीलावतार हैं. व्रज में उनकी लीलाएं चलती ही रहती हैं. श्रीकृष्ण स्वयं रसरूप हैं. वे अपनी रसमयी लीलाओं से सभी को अपनी ओर खींचते हैं. शनिवार को रासलीला के छठे दिन सुदामा चरित्र व श्रीकृष्ण-मिलन प्रसंग का मंचन किया गया. लीला में दिखाया गया कि श्राप मिलने के बाद सुदामा जी घर चले जाते है. कुछ दिनों बाद उनकी शादी सुशीला नामक युवती से होती है. धीरे-धीरे सुदामा जी श्राप के कारण गरीब होने लगते है. कुछ ही समय के बाद सुदामा जी इतने निर्धन हो जाते है कि उनके पास खाने के लिए घर में एक दाना नहीं रहता है. वे अन्य लोगों से मांग कर अपने जीवन की गाड़ी खिंचने लगते है. इसी बीच सुशीला ने उनके मित्र द्वारकापूरी जाकर भगवान श्रीकृष्ण से मिलने की बात कहती है. लेकिन सुदामा मिलना नहीं चाहते है. पत्नी के विशेष आग्रह पर मिलने को तैयार हो जाते है. सुदामा जी ने कहा कि मित्र से कुछ मांगना कुमित्र का काम होता है. तैयार होने पर पत्नी सुशीला ने पड़ोसन के घर से थोड़ा चावल मित्र कृष्ण को देने के लिए मांग लाती है. सुदामा किसी तरह द्वारकाकापुरी पहुंचते है. प्रवेश द्धार पर ही द्वारपालों ने सुदामा को रोक देता है. सुदामा ने कृष्ण के पास आने की सूचना देने की बात कहा तो द्वारपाल सुदामा का मजाक बना देते है. उन्हें जाने को कहते है. लेकिन सुदामा ब्राम्हण एक बार कृष्ण को सुचना देने की बात कहा. श्रीकृष्ण के पास पहुंच द्धारपाल ने जैसे ही सुदामा ब्राम्हण की गेट पर आने की सूचना दिया कि भगवान तुरंत दौड़कर सुदामा जी के पास आते है और गले लगा लेते है. सुदामा जी की द्वारकापुरी की महल में काफी सम्मान के साथ रखा गया. उन्हें भोजन वगैरह खिलाया गया. जाने के क्रम में श्रीकृष्ण ने चावल की पोटली मित्र सुदामा से ले लिया और खाने लगे. दो मुठी चावल खाते हुए सुदामा जी को दो लोकों की संपति दे दी. इसके साथ ही विश्वकर्मा जी के माध्यम से सुदामा जी को महल बना दिया गया.उक्त दृश्य को देख उपस्थित हजारों श्रद्धालु आनंदविभोर हो उठे.

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