दो कमरों में चल रहे दो विद्यालय

Updated at : 01 Dec 2017 6:50 AM (IST)
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दो कमरों में चल रहे दो विद्यालय

बदहाली. स्थापना के दस वर्ष बाद भी प्राथमिक स्कूल चौसा को नहीं मिली जमीन चौसा : शिक्षा विभाग का अजब-गजब कारनामे हैं. हालांकि ये विभाग के लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है. भले ही बच्चे भेंड़ बकरी की तरह एक ही कमरे में भर दिये जा रहे हों. विभाग को कोई परवाह नहीं है. […]

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बदहाली. स्थापना के दस वर्ष बाद भी प्राथमिक स्कूल चौसा को नहीं मिली जमीन

चौसा : शिक्षा विभाग का अजब-गजब कारनामे हैं. हालांकि ये विभाग के लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है. भले ही बच्चे भेंड़ बकरी की तरह एक ही कमरे में भर दिये जा रहे हों. विभाग को कोई परवाह नहीं है. जिले का ऐसा ही एक विद्यालय है नवसृजित प्राथमिक विद्यालय बहादुरपुर चौसा. यह विद्यालय पवनी पंचायत के प्राथमिक विद्यालय कटघरवां में वर्षों से चल रहा है.
दो कमरों में दो विद्यालय संचालित हो रहे हैं. जबकि दोनों विद्यालयों में एक से पांच कक्षा तक कुल 177 बच्चे पढ़ते हैं. अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे विद्यालय में बच्चे बैठते होंगे? वर्ष 2007 में विभाग द्वारा प्राथमिक विद्यालय बहादुरपुर की स्थापना की गयी लेकिन दस वर्ष बाद भी अभी तक उक्त विद्यालय को जमीन नहीं मिली.
स्थापना के शुरुआती दौर में बहादुरपुर बस्ती में ही जब खुले आसमान के नीचे विद्यालय संचालित हो रहा था, तब विद्यालय में नामांकित बच्चों की संख्या डेढ़ सौ से ज्यादा थी. शिक्षा विभाग द्वारा जब 2013 में इस विद्यालय को चौसा पंचायत से पवनी पंचायत के प्राथमिक विद्यालय कटघरवां में शिफ्ट किया गया, तब से बच्चों की संख्या आधे से भी कम 60 हो गयी है. कारण कि यह विद्यालय बहादुरपुर से काफी दूर चला गया. अभिभावक मजबूरन बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने लगे.
स्टोर रूम में चलता है कार्यालय और किचेन : बरसात में पानी टपकता रहता है. कटघरवां विद्यालय में भी 117 बच्चे नामांकित हैं. कमरे के अभाव में दोनों विद्यालयों के बच्चों को बैठने की जगह नहीं है. दोनों विद्यालयों को एक-एक कमरा मिला है, जिसमें इतने सारे बच्चों की बैठनी व्यवस्था, पढ़ाई, एमडीएम की सामग्री रखना, आॅफिस चलाना, स्टोर रूम, बेंच आदि रखने के चलते बच्चों को बरामदे में बैठा कर पढ़ाना पड़ता है. दोनों विद्यालयों का एमडीएम एक ही जर्जर किचेन शेड में बनता है. विद्यालय में लगा चापाकल का पानी पीने लायक नहीं है. रसोई के लिए गांव से पानी लाना पड़ता है. गांव के नाले का पानी विद्यालय परिसर में बराबर लगा रहता है. बरसात होने पर विद्यालय के बरामदे व कमरे में बरसात का पानी घुस जाता है.
शौचालय में बंद रहता है ताला : विद्यालय में शौचालय है लेकिन अक्सर ताला बंद रहता है, जिससे बच्चों को शौच करने या पेशाब करने जाने के लिए बाहर जाना पड़ता है. नाम मात्र के संसाधन में दो विद्यालयों के संचालित होने से शिक्षकों व बच्चों को काफी परेशानी होती है. विद्यालय परिसर में बच्चों को पानी पीने के लिए एक चापाकल है लेकिन उसका भी पानी पीने लायक नहीं है.
कैंपस में रहता है जलजमाव : कैंपस में बराबर जल-जमाव रहने से बच्चों में संक्रमित बीमारियां फैलने की संभावना बनी रहती है. एक विद्यालय को पंचायत से दूसरे पंचायत में शिफ्ट किये जाने के चलते छोटे-छोटे बच्चों को मेन सड़क पार कर काफी दूर जाने की इजाजत अभिभावक नहीं देते जिससे कई गरीब परिवार के छोटे बच्चे पढ़ाई से वंचित हो गये हैं.
अपना भवन नहीं होने के चलते दूसरी पंचायत के विद्यालय में चल रहा स्कूल
जमीन का नहीं मिला है एनओसी
करीब दस वर्षों से संचालित हो रहे इस विद्यालय को अभी तक अंचल विभाग से जमीन मुहैया नहीं करायी गयी है, जिसके चलते विद्यालय के भवन निर्माण का पैसा सर्व शिक्षा बक्सर में वर्षों से पड़ा है. जबकि स्थानीय जनप्रतिनिधियों के द्वारा चौसा मौजा में सरकारी भूमि को चिह्नित कर कई बार चौसा सीओ को आवेदन दिया गया लेकिन सीओ द्वारा अभी तक जमीन का एनओसी नहीं दिया गया, जिसके चलते चौसा पंचायत का विद्यालय पवनी पंचायत में विगत पांच वर्षों से चल रहा है.
गजेंद्र प्रसाद शर्मा, नवसृजित प्राथमिक विद्यालय बहादुरपुर चौसा के प्रभारी प्रधानाध्यापक
जगह चिह्नित कर ली गयी है, पर रास्ता नहीं है
विद्यालय के लिए चौसा मौजा में भूमि चिह्नित कर ली गयी है लेकिन उक्त सरकारी भूखंड तक जाने के लिए रास्ता नहीं है. रास्ते के लिए रैयतों से वार्ता की जा रही है. विद्यालय तक जाने का रास्ता मिलते ही जमीन का एनओसी विभाग को सौंप दिया जायेगा.
जितेंद्र कुमार सिंह, चौसा अंचलाधिकारी
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