राजगीर मलमास मेला में ‘दीदी की रसोई’ बनी श्रद्धालुओं का सहारा, मात्र 35 रुपये में मिल रही घर जैसी सात्विक थाली

Published by : Aditya Kumar Ravi Updated At : 25 May 2026 8:20 PM

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दीदी की रसोई

Malmas Mela 2026: राजगीर मलमास मेला में जिला प्रशासन द्वारा जीविका समूहों को आवंटित 25 भोजन स्टॉल श्रद्धालुओं के लिए बड़े मददगार साबित हो रहे हैं. 'दीदी की रसोई' के माध्यम से मात्र 35 रुपये में शुद्ध सात्विक भोजन परोसा जा रहा है, जिससे नौ दिनों में करीब 4 लाख रुपये का कारोबार हुआ है. यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ नारी सशक्तिकरण की एक सुंदर तस्वीर पेश कर रही है.

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Malmas Mela 2026 (रामविलास): राजगीर का ऐतिहासिक मलमास मेला इस बार केवल आस्था और अध्यात्म का केंद्र नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता और संगठित शक्ति का जीवंत उदाहरण बनकर उभर रहा है. जीविका समूहों से जुड़ी महिलाएं मेला क्षेत्र में अपने हुनर, अनुशासन और उद्यमिता से एक नई पहचान गढ़ रही हैं. जिला प्रशासन द्वारा मेला क्षेत्र में कुल 25 भोजन स्टॉल जीविका समूहों को उपलब्ध कराए गए हैं. इन स्टॉलों पर जिले के विभिन्न ग्रामीण इलाकों से आईं महिलाएं श्रद्धालुओं के लिए पूरी तरह से शुद्ध, पौष्टिक और सात्विक भोजन तैयार कर रही हैं. कम कीमत और बेहतर गुणवत्ता के कारण ‘दीदी की रसोई’ श्रद्धालुओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है.

महंगाई के दौर में सिर्फ 35 रुपये में भरपेट भोजन, श्रद्धालुओं में भारी संतोष

बढ़ती महंगाई के इस दौर में ‘दीदी की रसोई’ में मात्र 35 रुपये में पांच रोटी, सब्जी तथा दाल-चावल, सब्जी और अचार की थाली उपलब्ध कराई जा रही है. इतनी कम कीमत पर स्वच्छ और गर्म भोजन मिलने से मेले में आए श्रद्धालु काफी संतुष्ट नजर आ रहे हैं. भोजन कर रहे कई श्रद्धालुओं ने बताया कि मेले में जहां बाहर के होटलों और दुकानों में भोजन काफी महंगा है, वहीं जीविका दीदियों की रसोई घर जैसा स्वाद और शुद्धता का भरोसा दे रही है. प्रशासन द्वारा मेला क्षेत्र के सभी आश्रय स्थलों पर भी जीविका समूहों की महिलाओं को ही भोजन व्यवस्था की कमान सौंपी गई है.

नौ दिनों में हुआ लाखों का कारोबार, मजबूत हो रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, शुरुआती नौ दिनों के भीतर ही तीन हजार से अधिक श्रद्धालु मेला थाना क्षेत्र स्थित ‘दीदी की रसोई’ में भोजन कर चुके हैं. इससे अब तक 87 हजार 500 रुपये से अधिक की आमदनी दर्ज की जा चुकी है. वहीं, पूरे मेला क्षेत्र में संचालित सभी 25 स्टॉलों को मिलाकर अब तक करीब चार लाख रुपये का बड़ा कारोबार होने की जानकारी मिली है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी व्यवस्था से स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की श्रृंखला भी मजबूत हो रही है. भोजन बनाने में उपयोग होने वाला आटा गिरियक की पूजा दीदी की आटा चक्की से मंगाया जा रहा है. वहीं, सिलाव की मंजुला दीदी के मसाला उत्पादन केंद्र से शुद्ध मसालों की आपूर्ति की जा रही है. इसके साथ ही पर्यावरण के अनुकूल पत्तल और दोने की व्यवस्था सिलाव की किरण देवी द्वारा संभाली जा रही है. इस तरह उत्पादन से लेकर बिक्री तक, हर स्तर पर जीविका समूहों की महिलाओं की सीधी भागीदारी सुनिश्चित की गई है.

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