नालंदा की 52 बूटी साड़ी के लिए कभी रूठ जाती थीं दुल्हनें, सालों बाद भी चमक बरकरार

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Nalanda News Brides once flaunted Nalanda 52-boot saree artisans forced to work laborers

कारीगर की तस्वीर

Nalanda News : बिहार के नालंदा जिले की प्रसिद्ध ’52 बूटी साड़ी’ एक समय शादी-विवाह की पहली पसंद मानी जाती थी. खासकर दुल्हनों के बीच इसका ऐसा आकर्षण था कि बिना इस साड़ी के शादी की खरीदारी अधूरी समझी जाती थी. हाथों से बुनी गई इस पारंपरिक कला की पहचान देश ही नहीं, विदेशों तक रही है

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Nalanda News : ( सुनील कुमार) बिहार के नालंदा जिले की प्रसिद्ध ’52 बूटी साड़ी’ एक समय शादी-विवाह की पहली पसंद मानी जाती थी. खासकर दुल्हनों के बीच इसका ऐसा आकर्षण था कि बिना इस साड़ी के शादी की खरीदारी अधूरी समझी जाती थी.

हाथों से बुनी गई इस पारंपरिक कला की पहचान देश ही नहीं, विदेशों तक रही है. अब एक बार फिर यह ऐतिहासिक कला चर्चा में है और लोगों के बीच इसका आकर्षण बढ़ने लगा है.

कपिल देव प्रसाद सिंह ने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलवाया

इस कला को नई ऊंचाई देने में राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित स्वर्गीय कपिल देव प्रसाद सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा. नालंदा के बसवन बिगहा गांव के रहने वाले कपिल देव प्रसाद सिंह ने अपने जीवन को इस पारंपरिक बुनकरी कला के संरक्षण और विकास के लिए समर्पित कर दिया था. उन्होंने हजारों बुनकरों को प्रशिक्षित किया और 52 बूटी साड़ी को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई.

’52 बूटी’ नाम इसलिए पड़ा क्योंकि साड़ी पर हाथों से 52 प्रकार की बूटियों की डिजाइन बनाई जाती है. सूती और रेशमी धागों से तैयार इन साड़ियों में भारतीय संस्कृति और पारंपरिक कला की सुंदर झलक दिखाई देती है.

कभी बिहार की दुल्हन शादी में 52 बूटी साड़ी की जिद में रूठ जाती थी

एक समय ऐसा था जब बिहार की बेटियां अपनी शादी में 52 बूटी साड़ी पहनने की जिद करती थीं. गांव से लेकर शहर तक इसकी भारी मांग रहती थी. जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों तक यहां की साड़ियां, चादर और टेबल क्लॉथ निर्यात किए जाते थे.

लेकिन बदलते फैशन और मशीन से बने कपड़ों के कारण यह कला धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी. कई बुनकरों ने अपना पारंपरिक पेशा छोड़ दिया.

सरकार और हस्तशिल्प विभाग इस कला को फिर से जीवित करने का प्रयास कर रही

अब सरकार और हस्तशिल्प विभाग की पहल से इस कला को फिर से जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है.

स्थानीय बुनकरों का कहना है कि यदि उचित बाजार और प्रोत्साहन मिले तो नालंदा की 52 बूटी साड़ी एक बार फिर देश-दुनिया में अपनी पुरानी पहचान बना सकती है. यह केवल एक साड़ी नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक विरासत और बुनकरों की मेहनत की अमूल्य पहचान है.

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