बिहारशरीफ में सावन सोमवारी की बदली तस्वीर, बेलपत्र से गंगाजल तक मंदिर के बाहर उपलब्ध, 100-150 रुपये में मिल रही पूजा की थाली
शिवपुरी शिव मंदिर में अहले सुबह से उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
BiharSharif Sawan Somwari : बिहारशरीफ में सावन की दूसरी सोमवारी पर शिवालयों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी. इस बार पूजा के बदलते तौर-तरीकों ने सबका ध्यान खींचा. घर से तैयारी की परंपरा अब मंदिर के बाहर सामग्री खरीदने से बदल गई है.
BiharSharif Sawan Somwari : बिहारशरीफ में सावन की दूसरी सोमवारी पर सोमवार सुबह शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी. भोर होते ही महिलाएं और युवतियां पूजा की थाली लेकर मंदिर पहुंचने लगीं. हालांकि, इस बार शिवभक्ति के साथ पूजा के बदलते तौर-तरीके की चर्चा भी रही. पिछले पांच-दस वर्षों में घर से पूजा की तैयारी करने की परंपरा अब काफी हद तक मंदिर के बाहर उपलब्ध पूजा सामग्री से बदलती दिख रही है.
भोर होते ही शिवालयों की ओर बढ़ने लगे श्रद्धालु
सावन की दूसरी सोमवारी पर बिहारशरीफ शहर के प्रमुख शिवालयों में सुबह से ही आस्था का माहौल नजर आया. भोर होते ही श्रद्धालुओं के कदम मंदिरों की ओर बढ़ने लगे. महिलाओं और युवतियों की संख्या खास तौर पर अधिक रही. हाथों में पूजा की थाली, बेलपत्र और फूल लिए भक्तों ने भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक किया और पूजा-अर्चना की.
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पांच-दस साल में बदल गया सोमवारी की पूजा का अंदाज
शिवभक्ति और आस्था के बीच इस बार पूजा के बदलते तरीके की चर्चा भी होती रही. बुजुर्गों के अनुसार पिछले पांच-दस वर्षों में सावन सोमवारी की तैयारी काफी बदल गई है. पहले लोग पूजा से एक या दो दिन पहले ही सामग्री जुटाने लगते थे, जबकि अब बहुत से श्रद्धालु सीधे मंदिर पहुंचकर वहीं पूजा की सामग्री खरीद लेते हैं.
पहले घर में तैयार होती थी पूजा की थाली
शहरवासी विकास कुमार उर्फ गांधी जी बताते हैं कि करीब पांच वर्ष पहले तक सोमवारी की तैयारी एक दिन पहले से शुरू हो जाती थी. लोग शाम तक बेलपत्र, फूल, धतूरा और दूसरी पूजा सामग्री जुटाते थे. गंगाजल के लिए कई लोग पटना-बख्तियारपुर तक जाते थे. सुबह घर में पूजा की थाली सजाई जाती थी और परिवार के लोग साथ मंदिर के लिए निकलते थे.
पूजा स्थल की सफाई भी तैयारी का हिस्सा थी
पुराने समय में पूजा की तैयारी केवल सामग्री जुटाने तक सीमित नहीं रहती थी. कई घरों में सोमवारी से पहले पूजा स्थल की सफाई कर उसे पवित्र रखा जाता था. परिवार में पूजा को लेकर पहले से चर्चा होती थी और सामग्री जुटाने में बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक अपनी भूमिका निभाते थे. बुजुर्गों के मुताबिक यही तैयारी पूजा के भाव को और गहरा करती थी.
अब मंदिर के बाहर ही मिल रही पूजा की पूरी सामग्री
बिहारशरीफ के प्रमुख शिवालयों के आसपास सोमवार सुबह पूजा सामग्री की कई दुकानें सजी दिखीं. कहीं बेलपत्र और धतूरा की गठरी थी, तो कहीं आक और सफेद फूल के साथ गंगाजल की बोतलें रखी थीं. श्रद्धालु अपनी जरूरत के मुताबिक सामग्री खरीदते और सीधे मंदिर की कतार में शामिल हो जाते हैं.
100 से 150 रुपये में तैयार हो रही पूजा की थाली
मंदिरों के आसपास उपलब्ध सामग्री के अनुसार 11 से 21 बेलपत्र की छोटी गठरी करीब 10 से 15 रुपये में मिल रही है. धतूरा के फूल 15 से 20 रुपये, आक के फूल 10 से 15 रुपये और सफेद फूल 10 से 20 रुपये तक में उपलब्ध हैं. करीब 100 एमएल गंगाजल के लिए 55 रुपये तक खर्च हो रहे हैं. मात्रा और गुणवत्ता के अनुसार सामान्य पूजा सामग्री पर करीब 100 से 150 रुपये खर्च हो रहे हैं.
भागदौड़ भरी जिंदगी ने बदला पूजा का तरीका
विकास कुमार उर्फ गांधी जी के मुताबिक अब भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास पहले जैसी तैयारी के लिए समय कम है. श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं और वहीं जरूरत के अनुसार पूजा सामग्री खरीद लेते हैं. कुछ ही मिनटों में पूजा की थाली तैयार हो जाती है. जलाभिषेक और पूजा के बाद कई लोग अपने काम पर लौट जाते हैं.
बुजुर्ग बोले, सुविधा बढ़ी लेकिन तैयारी का भाव कम हुआ
बुजुर्गों का कहना है कि बाजार में पूजा सामग्री आसानी से उपलब्ध होने से श्रद्धालुओं की सुविधा जरूर बढ़ी है. लेकिन पहले पूजा से जुड़ी तैयारी भी भक्ति का अहम हिस्सा होती थी. सोमवारी से पहले घर में सामग्री जुटाने और पूजा स्थल तैयार करने का माहौल बनता था. समय की कमी के कारण यह परंपरा अब काफी बदल गई है.
युवाओं को मंदिर के बाहर मिलने वाली सुविधा पसंद
वहीं युवाओं के लिए मंदिर के आसपास पूजा सामग्री की उपलब्धता सुविधा का नया रूप है. उनका मानना है कि कम समय में पूजा की तैयारी हो जाती है और कामकाज भी प्रभावित नहीं होता. इस बदलाव ने पूजा की प्रक्रिया को आसान बनाया है, भले ही इसकी तैयारी का तरीका बदल गया हो.
आस्था वही, शिव तक पहुंचने का रास्ता बदला
सावन सोमवारी की पूजा में आस्था और भगवान शिव के प्रति श्रद्धा आज भी कायम है. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले पूजा की तैयारी घर से शुरू होकर मंदिर तक पहुंचती थी, जबकि अब मंदिर के बाहर ही पूजा की थाली तैयार हो जाती है. बदलती जीवनशैली के बीच यह बदलाव धार्मिक परंपरा और आधुनिक सुविधा के बीच बनते नए संतुलन की तस्वीर दिखाता है.
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लेखक के बारे में
By कंचन कुमार
कंचन कुमार वर्ष 2009 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उत्तराखंड से शुरुआत करने के बाद दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पटना, नवादा और बिहारशरीफ में विभिन्न मीडिया संस्थानों के साथ कार्य किया. पिछले 12 वर्षों से प्रभात खबर बिहारशरीफ कार्यालय में नालंदा जिला रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं. जिला प्रशासन, खोजी एवं विशेष रिपोर्ट, जमीनी पड़ताल, विकास, जनसरोकार के मुद्दों तथा लोकसभा और विधानसभा चुनावों के गहन विश्लेषण के लिए उनकी विशेष पहचान है.
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