16 जुलाई को सिल्क सिटी में निकलेगी भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा, चार स्थानों पर तैयारियां तेज

नया बाजार सखीचंद घाट मंदिर में एकांतवास में हैं भगवान जगन्नाथ.
Jagannath Rath Yatra : भागलपुर में 16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा का आयोजन होगा. इस वर्ष 125वीं रथयात्रा का विशेष महत्व है, जिसमें पुरी से लाए गए विशेष वस्त्रों से सजाए गए रथ पर भगवान नगर भ्रमण करेंगे. 17 दिनों के अनवसर काल के बाद भगवान भक्तों को दर्शन देंगे.
Jagannath Rath Yatra : आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर 16 जुलाई को सिल्क सिटी भागलपुर के नया बाजार, सुजागंज बाजार, गिरधारी साह हाट और चंपानगर से भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा निकाली जाएगी. रथयात्रा को लेकर सभी मंदिरों में तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं. मंदिरों की रंगाई-पुताई, साफ-सफाई और रथों की मरम्मत का कार्य अंतिम चरण में है.
125वीं रथयात्रा बनेगी विशेष आकर्षण
नया बाजार स्थित सखीचंद घाट रोड जगन्नाथ मंदिर में इस वर्ष 125वीं रथयात्रा निकाली जाएगी. मंदिर के पंडित समीर मिश्रा और पंडित सौरभ मिश्र ने बताया कि इस अवसर पर मंदिर का विशेष सौंदर्यीकरण कराया जा रहा है. वैदिक मंत्रोच्चार के बीच रथयात्रा नया बाजार से निकलकर कोतवाली चौक, स्टेशन चौक, सुजागंज, वैरायटी चौक, खलीफाबाग चौक, दीपनगर चौक और बूढ़ानाथ चौक होते हुए पुनः मंदिर पहुंचेगी.
पुरी से लाए गए विशेष वस्त्र से सजेगा रथ
सुजागंज बाजार स्थित बाटा गली के जगन्नाथ मंदिर के सेवक मुकेश कुमार मिश्रा ने बताया कि इस बार रथ को जगन्नाथपुरी से लाए गए विशेष कपड़े से सजाया जाएगा. 15 जुलाई को भगवान को छप्पन भोग अर्पित किया जाएगा और भंडारे का आयोजन होगा. अगले दिन रथयात्रा मंदिर से निकलकर वैरायटी चौक, खलीफाबाग और स्टेशन चौक होते हुए पुनः मंदिर लौटेगी.
17 दिनों के अनवसर काल के बाद देंगे दर्शन
29 जून को स्नान यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ को परंपरा के अनुसार 17 दिनों के अनवसर (अना सार) काल में विशेष कक्ष में विराजमान रखा गया है. इस दौरान उन्हें औषधीय जड़ी-बूटियों से बने काढ़े और विशेष भोग अर्पित किए जा रहे हैं तथा भक्तों के लिए प्रत्यक्ष दर्शन बंद हैं. 16 जुलाई को भगवान पुनः भक्तों को दर्शन देंगे और रथयात्रा के लिए नगर भ्रमण पर निकलेंगे.
मौसी घर की यात्रा का है विशेष महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार रथयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी रोहिणी के घर के लिए प्रस्थान करते हैं. वहां उन्हें विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है और दशमी तिथि तक प्रवास के बाद वे पुनः अपने मंदिर लौटते हैं. यही परंपरा सदियों से श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जा रही है.
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