90 के दशक में भागलपुर आये थे शायर पद्मश्री डॉ बशीर बद्र, मित्र बसंत गोष्ठी में पढ़ी थी नज्म

Published by : SANJEEV KUMAR JHA Updated At : 29 May 2026 9:07 AM

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मारवाड़ी युवा मंच के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जगदीशचंद्र मिश्र ने बताया कि 1992 में डॉ बद्र भागलपुर आये थे.

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भागलपुर से दीपक राव की खबर : प्रसिद्ध शायर और पद्मश्री डॉ बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद भोपाल में गुरुवार को निधन हो गया है. उनके निधन की खबर से देश-दुनिया के साथ-साथ भागलपुर के साहित्यप्रेमियों में भी शोक की लहर दौड़ गयी है. भागलपुर, जो हमेशा से साहित्य और संस्कृति का केंद्र रहा है, वहां डॉ बद्र की कई यादें जुड़ी हुई हैं.

भागलपुर से था गहरा जुड़ाव

साहित्य और संस्कृति की धरती भागलपुर में 90 के दशक में डॉ बशीर बद्र का आगमन हुआ था. मारवाड़ी युवा मंच के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जगदीशचंद्र मिश्र ”पप्पू” ने पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया कि 1992 में आयोजित ”मित्र बसंत गोष्ठी” के अंतर्गत अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में डॉ बद्र शामिल हुए थे. वहां उन्होंने अपनी स्वरचित शायरियों और नज्मों से श्रोताओं का दिल जीत लिया था. उस कार्यक्रम में उन्होंने अपनी कला का ऐसा जादू बिखेरा कि भागलपुर के साहित्यप्रेमियों के साथ उनका एक अटूट रिश्ता कायम हो गया.

शायरी में जिंदा रहेंगे डॉ बशीर बद्र

डॉ बशीर बद्र अपनी सहज भाषा और दिल को छू लेने वाली गजलों के लिए हमेशा याद किये जायेंगे. उनकी शायरी की ये अमर पंक्तियां आज भी लोगों की जुबान पर हैं. “सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा, इतना मत चाहो उसे वह बेवफा हो जायेगा. उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये. “

शहर के साहित्यकारों ने दी श्रद्धांजलि

उनके निधन पर भागलपुर के साहित्य जगत ने गहरा दुख व्यक्त किया है. ”कविता भागलपुर” के संयोजक प्रो चंद्रेश ने कहा कि यह केवल एक शायर का नहीं, बल्कि साहित्य की एक अमूल्य धरोहर का जाना है. इस दुख की घड़ी में कथाकार रंजन, गजलकार एकराम हुसैन शाद, डॉ अमरेंद्र, बिहार अंगिका अकादमी के निवर्तमान अध्यक्ष डॉ लखनलाल सिंह ”आरोही”, जगतराम साह ”कर्णपुरी” और डॉ नवीन निकुंज समेत अनेक प्रबुद्धजनों ने शोक व्यक्त करते हुए उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है. साहित्य जगत का मानना है कि डॉ बशीर बद्र भले ही हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी कालजयी रचनाएं हमेशा पाठकों और श्रोताओं के दिलों में जीवित रहेंगी.

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