अंग क्षेत्र में शुरू हुआ एक माह का बिहुला-विषहरी महापर्व, आज निकलेगी बारी कलश शोभायात्रा, जानिए पूजा का धार्मिक महत्व

चंपानगर विषहरी स्थान में पूजा. | Prabhat Khabar Network
Bhagalpur News: अंग प्रदेश का ऐतिहासिक बिहुला-विषहरी महापर्व गुरुवार से शुरू हो गया है. आज 17 जुलाई को बारी कलश शोभायात्रा निकाली जाएगी और पहली डलिया अर्पित की जाएगी. जानिए इस एक माह चलने वाले अनुष्ठान का महत्व.
Bhagalpur News: अंग प्रदेश की लोकआस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बिहुला-विषहरी पूजा गुरुवार से एक माह के धार्मिक अनुष्ठान के साथ शुरू हो गई. भागलपुर, बांका समेत पूरे अंग क्षेत्र में महिलाओं ने व्रत रखकर माता विषहरी की पूजा-अर्चना की और सती बिहुला के गीतों से वातावरण भक्तिमय हो उठा. इस वर्ष कर्क संक्रांति 16 जुलाई को नहीं पड़ने के कारण 17 जुलाई, शुक्रवार को बारी कलश शोभायात्रा निकाली जाएगी और पहली यानी छोटी डलिया चढ़ाई जाएगी.
आज निकलेगी बारी कलश शोभायात्रा, पहली डलिया होगी अर्पित
विषहरी पूजा महासमिति के प्रवक्ता सह कार्यकारी अध्यक्ष प्रदीप कुमार ने बताया कि शुक्रवार को वैदिक विधि-विधान के साथ कुम्हार के घर पूजा होगी. इसके बाद सेमापुर घाट से जल भरकर बारी कलश स्थापित किया जाएगा.
इसी दिन माता विषहरी को पहली डलिया अर्पित की जाएगी. इसके बाद महिलाएं व्रत खोलकर भोजन ग्रहण करेंगी. परंपरा के अनुसार पूरे अनुष्ठान की शुरुआत इसी विधि से होती है.
गूंजने लगे सती बिहुला के लोकगीत
पूजा शुरू होते ही भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों में सती बिहुला के पारंपरिक लोकगीत गूंजने लगे हैं. गुरुवार को महिलाओं ने दिनभर उपवास रखकर माता विषहरी की आराधना की.
चंपानगर विषहरी स्थान में पंडित संतोष झा ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजा संपन्न कराई. इस दौरान महिलाओं ने पारंपरिक गीत गाकर देवी का आवाहन किया.
एक दिन पिंडी रहती है खाली, फिर शुरू होती है नियमित पूजा
प्रदीप कुमार ने बताया कि वर्ष में केवल एक दिन ऐसा होता है, जब माता विषहरी की पिंडी पर बारी कलश नहीं रहता. इस दिन केवल बेंत रखकर विशेष पूजा की जाती है. शेष 364 दिनों तक पिंडी पर बारी कलश स्थापित रहता है.
गुरुवार को इसी परंपरा का पालन करते हुए मां विषहरी सहित अन्य देवी-देवताओं का आवाहन किया गया.
17 से 19 अगस्त तक होगा मुख्य आयोजन
पूजा का मुख्य आयोजन 17 अगस्त से 19 अगस्त तक होगा. 17 अगस्त को महिलाएं बड़ी डलिया चढ़ाएंगी, जिसके बाद तीन दिनों तक धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित होंगे.
मंजूषा गुरु मनोज पंडित ने बताया कि सती बिहुला भारतीय लोक परंपरा में नारी शक्ति, अटूट विश्वास और समर्पण का प्रतीक हैं. मान्यता है कि उन्होंने अपने सतीत्व के बल पर इंद्रलोक से अपने पति और अन्य लोगों को पुनर्जीवित कराया था.
Bhagalpur News: 98 से बढ़कर 182 स्थानों तक पहुंची पूजा की परंपरा
अंग क्षेत्र में कभी सीमित समुदाय तक रहने वाली बिहुला-विषहरी पूजा अब जन-जन का महापर्व बन चुकी है.
पिछले 15 वर्षों में भागलपुर जिले में पूजा स्थलों की संख्या 98 से बढ़कर 182 हो गई है. अब शहर और गांवों में प्रतिमा स्थापना, धार्मिक आयोजन और मेले का आयोजन बड़े पैमाने पर होने लगा है.
युवाओं की बढ़ती भागीदारी ने इस लोकपर्व को नई पहचान दी है. बिहुला की लोकगाथा पर कई नाटक, सांस्कृतिक कार्यक्रम और फिल्में भी बन चुकी हैं, जिससे इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है.
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