अंगक्षेत्र में सूर्य उपासना के प्रमाण हैं प्राचीन मूर्तियां, धर्मग्रंथाें में भी है वर्णन
अंगक्षेत्र में सूर्य उपासना के प्रमाण हैं प्राचीन मूर्तियां, धर्मग्रंथाें में भी है वर्णन
– विक्रमशिला महाविहार, अजगैबीनाथ व मुरली पहाड़ी, मंदार पहाड़ी, चंपानगर, बटेश्वर स्थान रहा है सूर्य उपासना का केंद्र
– गुप्त व पाल काल में बनीं कई मूर्तियां भागलपुर, बांका व मुंगेर जिला में खुदाई में मिलीं
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छठ व्रत का सुंदर वर्णन मनसा महात्म्य में
क्षेत्रीय इतिहास के जानकार आलोक कुमार बताते हैं कि छठ महापर्व का प्रारंभ अंग महाजनपद से माना जाता है. यह वर्ष में दो बार चैत्र व कार्तिक मास में होता है. सृष्टि की शुरुआत में मूल प्रकृति के छठे अंश से जगत तारिणी भगवती षष्ठी प्रकट हुईं थीं जो जगत में पुत्रदा के नाम से सुविख्यात हुईं. राजा प्रियव्रत ने अपनी पत्नी मालिनी देवी के साथ छठव्रत किया था. यह शोध का विषय है कि चंपा का प्राचीन नाम मालिनी राजा प्रियव्रत की महारानी के नाम पर था.
चंपानगर में शिव के साथ सूर्य की होती है पूजा सातवीं व आठवीं सदी के पालकालीन सूर्य प्रतिमा अंगक्षेत्र की प्राचीन राजधानी चंपानगर में आज भी पूजित हैं. पथरघटनाथ शिव मंदिर में सूर्य की प्रतिमा काले पत्थर की बनी हुई है. इसमें भगवान सूर्य सात अश्वों के रथ पर सवार हैं. यह मंदिर तंत्र सिद्धि का केंद्र रहा है. इस मंदिर में शिव के साथ सूर्य की पूजा होती है. यहां एक ही अरघे में दो शिवलिंग स्थापित हैं. जिसका अंतराल पांच अंगुली है. इलाके के पुराने लोग बताते हैं कि आजादी के कुछ दिन पूर्व तक इस मंदिर में अपना गला काट कर बलि देते हुए एक तांत्रिक को देखने की चर्चा है. इससे सटे सेमापुर घाट की महत्ता बिहुला विषहरी पूजा से संबंधित है.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
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