संदर्भ एनएच-80 की दुर्दशा: ...क्योंकि हमें झूठ बोलने की आदत है

Updated at : 30 Jul 2018 3:32 AM (IST)
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संदर्भ एनएच-80 की दुर्दशा:  ...क्योंकि हमें झूठ बोलने की आदत है

जीवेश रंजन सिंह भागलपुर शहर एनएच 80 पर बसा है. बसावट के हिसाब से बात करें, तो यह प्रचलन में है कि अगर जमीन के पास से कोई सड़क निकल जाये तो जमीन की कीमत दोगुनी और जीवन की गति तेज हो जाती है. उदाहरण हजारों हैं कि कहीं किसी जमीन के बगल से किसी […]

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जीवेश रंजन सिंह

भागलपुर शहर एनएच 80 पर बसा है. बसावट के हिसाब से बात करें, तो यह प्रचलन में है कि अगर जमीन के पास से कोई सड़क निकल जाये तो जमीन की कीमत दोगुनी और जीवन की गति तेज हो जाती है. उदाहरण हजारों हैं कि कहीं किसी जमीन के बगल से किसी सड़क का प्लान हुआ नहीं कि जमीन की कीमत रातोंरात बढ़ गयी. पर भागलपुर के संबंध में इससे उलट दिखता है. जीवन की गति तेज होने की जगह धीमी हो गयी है. अब तो हालत यह है कि शहर के प्रबुद्ध से लेकर चाय दुकानों पर ज्ञान बघारनेवाले भी इस पर चर्चा नहीं करते. क्योंकि सब यह मानने लगे हैं कि अधिकारी से लेकर नेता (कुछ अपवाद भी हैं) झूठ बोलते हैं.

ऐसे में शनिवार को इस चर्चा को बल दे दिया भागलपुर इंजीनियरिंग कालेज के बच्चों ने. भागलपुर जीरो माइल से लेकर इंजीनियरिंग कालेज तक बच्चों ने पानी में भीग कर पांच जगह जाम कर दिया. सड़क जाम करना गुनाह है, पर हाल के दिनों में आप उस सड़क से गुजरे हों तो यह महसूस कर सकते हैं कि उन्होंने कोई पाप नहीं किया, बल्कि जड़ हो गयी व्यवस्था में हलचल पैदा करने की कोशिश की है. ये बच्चे देश के विभिन्न राज्यों से सुनहरे सपने लिये आये हैं. सड़क के कारण उनका कैंपस से निकलना मुहाल हो गया है. कौन-सी छवि लेकर जायेंगे ये. ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि शनिवार को छात्रों को सात दिन में सड़क मोटरेबल करने का आश्वासन देनेवाले विभाग ने रविवार को सिर्फ एक जेसीबी और सीमित संसाधन लगा कर ऊंट के मुह में जीरा का काम किया और फिर यह कहते हुए हाथ झाड़ लिया कि जब तक यातायात बंद नहीं होगा, काम संभव नहीं. बड़ी बात यह कि स्थानीय अधिकारी कहते हैं कि काम नहीं हो सकता और पटना में बैठे अधिकारी कहते हैं कि हरहाल में मोटरेबल करना ही है. अब सच क्या है और झूठ क्या इसका आकलन खुद करें.

याद रहे इस सड़क से होकर न सिर्फ भागलपुर जिले, न सिर्फ एनटीपीसी, बल्कि झारखंड व बंगाल के भी लोग व गाड़ियां आती हैं, पर अब कोई इस रास्ते होकर नहीं चलना चाहता. बसें चलनी बंद हो चुकी हैं. इससे कई लोगों का रोजगार बंद है. प्राइवेट गाड़ियां, कुछ अॉटो और ट्रकों के रेलमपेल में सारी व्यवस्था फेल है. अब रेल ही एक मात्र विकल्प है. खास कर सबौर से लेकर जीरोमाइल तक की तो दशा बदतर है. यह सावन का महीना है. हर इलाके से लोग आयेंगे, क्या अनुभव होगा उनका.

सड़क के मामले में यह दशा दुखद है. मधेपुरा जाने के दौरान भी यही दुख. सहरसा में रेलवे क्रासिंग के लिए कुछ ऐसी ही परेशानी, भागलपुर के भोलानाथ पुल के नीचे से गुजरने में बरसात तो बरसात सूखे के दिनों में भी हाड़ कांपता है. इन सभी इलाकों से बड़े और प्रभावशाली लोग गुजरते हैं, पर उन्हें कुछ नहीं दिखता. इन समस्याओं की बैसाखी के भरोसे कई नेताओं ने बैरतनी पार कर ली. विभाग के अधिकारियों की तो झूठ-सच का आंकलन (हालांकि कुछ अपवाद भी हैं) करने बैठें, तो महीनों बीत जायेंगे. सच यह है कि संबंधित अधिकारी और उनकी कोताही पकड़नेवालों के लिए अब ये कष्ट मायने नहीं रखते. अब तो ऐसे समय में ही कोई काम शुरू किया जाता है जब काम की गुणवत्ता पकड़ी नहीं जा सके. उदाहरणस्वरूप भागलपुर सहित कई जिलों में अब जबकि बरसात शुरू हो गयी है नाली बनाने का काम निगम और अन्य विभागों ने शुरू कर दिया है. एक तरफ काम हो रहा और दूसरी ओर से बह जा रहा. इस कारण भले ही फायदा आम लोगों को कुछ नहीं हो, पर संबंधित कुछ लोगों को फायदा जरूर हो रहा है.

सावन का महीना है. झारखंड के बाद अगर किसी की सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा दावं पर है तो वह है भागलपुर जिला प्रशासन की. सारे पदाधिकारी रोज भागलपुर से सुलतानगंज की दूरी इस कारण नाप रहे कि प्रतिष्ठा न जाये. ऐसे में सड़क या अन्य विभागों से संबंधित पदाधिकारियों की ही यह जवाबदेही बनती है कि वो कुछ तो प्रतिष्ठा बचा लें, वरना जब रविवार को प्रभात खबर में छपी तसवीर फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्वीटर पर शेम का विषय बनी हुई रहे, तब हम अपना कॉलर खड़ा रखकर भी क्या कर लेंगे.

और अंत में सावन का महीना है. सभी भक्त यह कहते हुए चलते हैं : …बाबा एक सहारा है. अब इसी सहारे के बल क्या आशा करें कि अधिकारी और जननेता झूठ की जगह सच बोलेंगे और एनएच 80 पर बसने का दुख नहीं सुख महसूस कर सकेंगे भागलपुरवासी.

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