बेगूसराय के स्वतंत्रता सेनानी रामेश्वर सिंह की कहानी, मजिस्ट्रेट के सामने भी नहीं झुकी मूंछें, अंग्रेजों ने दी थी छह माह की सजा

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स्वतंत्रता सेनानी रामेश्वर सिंह की फाइल फोटो

जानें रामेश्वर सिंह की अविश्वसनीय कहानी, जिन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने 'आजादी' को अपना नाम बताया और अंग्रेजों की क्रूर यातनाएं सहकर भी देश के लिए अपना संघर्ष जारी रखा. उनकी देशभक्ति की मिसाल आज भी प्रेरणा देती है.

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Begusarai Freedom Fighter Rameshwar Singh: आजादी की लड़ाई का इतिहास केवल बड़े नेताओं और बड़े आंदोलनों की कहानी नहीं है. इसके पन्नों में ऐसे अनगिनत गुमनाम वीरों की गाथाएं भी दर्ज हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए असहनीय यातनाएं सहीं, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया. बेगूसराय जिले के मंझौल गांव के स्वतंत्रता सेनानी रामेश्वर सिंह की कहानी भी अदम्य साहस और देशभक्ति की मिसाल है.

मजिस्ट्रेट ने पूछा- नाम क्या है, जवाब मिला- आजादी

वर्ष 1931 में महात्मा गांधी के आह्वान पर चल रहे सविनय अवज्ञा आंदोलन और व्यक्तिगत सत्याग्रह में रामेश्वर सिंह ने भाग लिया था. इसी क्रम में वे भागलपुर जिले के बिहपुर थाना क्षेत्र पहुंचे, जहां अंग्रेजी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

गिरफ्तारी के बाद पुलिस और मजिस्ट्रेट के सामने भी रामेश्वर सिंह का हौसला कम नहीं हुआ. पूछताछ के दौरान मजिस्ट्रेट ने पूछा कि नाम क्या है. उन्होंने जवाब दिया- आजादी. मजिस्ट्रेट ने पूछा कि घर कहां है, तो जवाब मिला- आजादी. फिर पूछा गया कि क्या करते हो, रामेश्वर सिंह ने फिर कहा- आजादी.

उनके निर्भीक जवाब और अंग्रेजी शासन के प्रति चुनौतीपूर्ण रवैये से मजिस्ट्रेट नाराज हो गया. उसने सिपाहियों को उन्हें ले जाने और उनकी मूंछ के एक-एक बाल उखाड़ने का आदेश दिया. इसके साथ ही उन्हें छह महीने की जेल की सजा सुनाई गई.

जेल में दी गई यातना, बेहोश हो गए रामेश्वर सिंह

रामेश्वर सिंह की पहचान उनकी कड़कती मूंछों और बेखौफ व्यक्तित्व से भी थी. बताया जाता है कि मजिस्ट्रेट के सामने भी वे अपनी मूंछों पर ताव देते रहे. अंग्रेजी शासन के लिए इसे चुनौती माना गया.

जेल पहुंचने के बाद सिपाहियों ने उन्हें बांध दिया. जेलर के सामने उनकी मूंछों के बाल एक-एक कर उखाड़े गए. यातना के कारण वे बेहोश हो गए. उनके चेहरे और शरीर पर चोट के निशान पड़ गए थे.

जेल में मौजूद उनके साथियों ने उनकी सेवा की. गर्म पानी से घाव साफ किए गए. उन्हें दाल, पानी और दूध का भोजन दिया गया. कई महीनों तक इलाज और देखभाल के बाद उनके घाव ठीक हो सके. इसके बाद उन्होंने अपनी छह महीने की सजा पूरी की और जेल से बाहर निकले.

रामकिशोर सिंह के साथ आंदोलन में रहे सक्रिय

रामेश्वर सिंह अकेले स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय नहीं थे. वे अपने ग्रामीण और बेगूसराय जिले के प्रथम स्वतंत्रता सेनानियों में शुमार मंझौल निवासी रामकिशोर सिंह उर्फ रामबाबू के साथ लगातार आंदोलन में सक्रिय रहे.

दोनों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ लोगों में जागरूकता पैदा करने और स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत करने में योगदान दिया. उनके लिए आजादी केवल नारा नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य थी. अंग्रेजों की यातनाएं भी उनके हौसले को नहीं तोड़ सकीं.

आजादी के बाद पेंशन लेने से भी किया इनकार

देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद सरकार की ओर से स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान स्वरूप पेंशन दिए जाने की व्यवस्था की गई. लेकिन रामेश्वर सिंह ने यह पेंशन लेने से इनकार कर दिया. उनका मानना था कि देश को आजादी दिलाने के लिए उन्होंने जो कष्ट सहे, वह किसी मेहनताने या इनाम के लिए नहीं था. उनका संघर्ष मातृभूमि को गुलामी से मुक्त कराने के लिए था.

मंझौल की मिट्टी में आज भी जिंदा है वीरता की कहानी

रामेश्वर सिंह की कहानी उस दौर की याद दिलाती है, जब आजादी के दीवानों के लिए जेल, लाठी, यातना और मौत का भय भी देशभक्ति के रास्ते में बाधा नहीं बन सका था. अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें यातना दी और छह महीने के लिए जेल में डाल दिया, लेकिन उनके भीतर की आजादी की भावना को नहीं तोड़ सकी.

ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाओं को याद करना इसलिए भी जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां समझ सकें कि देश की आजादी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि असंख्य लोगों के त्याग, संघर्ष और बलिदान का परिणाम है.


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Vikash Kumar

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