बेगूसराय में सरकार के वादों से टूटी उम्मीद, फिर ग्रामीणों ने खुद ही बना डाला पुल

Published by : Vivek Singh Updated At : 19 May 2026 7:53 AM

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पुल की तस्वीर

Bihar News : बेगूसराय जिले के बखरी प्रखंड के भैरवा और आसपास के गांवों का है. यहां बागमती नदी पर पुल बनाने की मांग कोई नई नहीं है. चुनाव आते ही नेताओं ने पुल, सड़क और बेहतर आवागमन का सपना दिखाया,वोट लिया और फिर वादे हवा हो गए. ग्रामीणों का कहना है कि कई सरकारें बदलीं,पक्ष और विपक्ष बदलते रहे,लेकिन उनकी जिंदगी नहीं बदली. स्थानीय लोगों के मुताबिक वर्तमान विधायक संजय पासवान बिहार सरकार में गन्ना मंत्री भी हैं. लेकिन इसके बावजूद इलाके की सबसे बड़ी समस्या जस की तस बनी हुई है.

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Bihar News: (विकाश मिश्रा) बेगूसराय में एक गांव के लोगों ने कहा , जब तक तोड़ेंगे नहीं , तब तक छोड़ेंगे नहीं.

फिल्मी पर्दे पर सुनाई देने वाला यह डायलॉग अब बेगूसराय में हकीकत बन चुका है. फर्क सिर्फ इतना है कि यहां किसी हीरो ने नहीं, बल्कि गांव के आम लोगों ने सिस्टम की बेरुखी को चुनौती दी है. वर्षों तक नेताओं के वादों और सरकारी फाइलों में अटके पुल का इंतजार करते-करते ग्रामीण इतने परेशान हो गए कि आखिरकार उन्होंने खुद ही नदी पर पुल बना डाला.

दशकों से सिर्फ वादे, जमीन पर कुछ नहीं

मामला बेगूसराय जिले के बखरी प्रखंड के भैरवा और आसपास के गांवों का है. यहां बागमती नदी पर पुल बनाने की मांग कोई नई नहीं है. चुनाव आते ही नेताओं ने पुल, सड़क और बेहतर आवागमन का सपना दिखाया,वोट लिया और फिर वादे हवा हो गए. ग्रामीणों का कहना है कि कई सरकारें बदलीं,पक्ष और विपक्ष बदलते रहे,लेकिन उनकी जिंदगी नहीं बदली. स्थानीय लोगों के मुताबिक वर्तमान विधायक संजय पासवान बिहार सरकार में गन्ना मंत्री भी हैं. लेकिन इसके बावजूद इलाके की सबसे बड़ी समस्या जस की तस बनी हुई है.

मरीजों को खाट पर ढोना पड़ता था

ग्रामीण बिट्टू कुमार,मनोज कुमार,बलराम महतों समेत कई लोगों ने बताया कि पुल नहीं होने से हालात बेहद खराब थे. गर्भवती महिलाओं,बुजुर्गों और मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए खाट का सहारा लेना पड़ता था. बारिश और बाढ़ के दिनों में स्थिति और भयावह हो जाती थी. ग्रामीणों के अनुसार,अस्पताल पहुंचने के लिए पहले करीब 9 किलोमीटर का लंबा चक्कर लगाना पड़ता था. बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती रही. कई बच्चे स्कूल तक नहीं पहुंच पाए,क्योंकि रास्ता ही सबसे बड़ी बाधा था.

चंदा जुटाया,मजदूरी दी और खुद बना लिया पुल

सरकारी मदद की उम्मीद टूटने के बाद गांव वालों ने हार नहीं मानी. उन्होंने आपस में चंदा इकट्ठा करना शुरू किया. किसी ने 100 रुपये दिए,किसी ने 200 रुपये तो कई लोगों ने मजदूरी देकर योगदान किया. इसी सामूहिक प्रयास से नदी पर एक अस्थायी जुगाड़ पुल तैयार कर दिया गया. अब इसी पुल के सहारे ग्रामीण आवाजाही कर रहे हैं. हालांकि इस पुल के बने हुए कई साल पूरे हो गए और यह पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. ग्रामीणों का कहना है कि इस पुल पर हादसे भी हुए हैं और दो लोगों की जान तक जा चुकी है. मौत के बाद प्रशासन जरूर पहुंचा,लेकिन कार्रवाई सिर्फ खानापूर्ति तक सीमित रही.

कमजोर पुल,लेकिन मजबूत संदेश

यह पुल देखने में भले कमजोर लगता हो,लेकिन यह उस मजबूत इरादे की मिसाल है,जिसने सरकारी उदासीनता के खिलाफ आवाज उठाई है. ग्रामीणों ने साबित कर दिया कि अगर व्यवस्था जिम्मेदारी भूल जाए,तो आम लोग भी अपनी जिंदगी की राह खुद बना सकते हैं.

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