बेगूसराय में 69 वर्षो से चल रहा भवन विहीन विद्यालय, मंदिर ने संभाल रखा सैकड़ों बच्चों का भविष्य

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Begusarai News school without building been running Begusarai 69 years

विद्यालय की तस्वीर

Begusarai News: भारत सरकार जहां एक ओर सरकार शिक्षा को विकास की सबसे बड़ी कुंजी बताती है. वहीं दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों की हकीकत आज भी सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर रही है.

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Begusarai News: (विकाश मिश्रा )भारत सरकार जहां एक ओर सरकार शिक्षा को विकास की सबसे बड़ी कुंजी बताती है. वहीं दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों की हकीकत आज भी सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर रही है.

बेगूसराय जिले के खोदावंदपुर प्रखंड स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय मेघौल कन्या इसकी एक मार्मिक मिसाल बन चुका है. वर्ष 1957 में स्थापित यह विद्यालय आज लगभग 69 वर्षो बाद भी अपने भवन के लिए तरस रहा है.

आज भी शिक्षा बरामदे, मंदिर परिसर और तंग कमरों में सिमटी

विडंबना देखिए कि जिस जगह बच्चों के सपनों को आकार मिलना चाहिए,वहां आज भी शिक्षा बरामदे,मंदिर परिसर और तंग कमरों में सिमटी हुई है. विद्यालय अब भी शिव-पार्वती मंदिर परिसर की जमीन पर संचालित हो रहा है.

मंदिर की भव्यता और चमक दूर से लोगों का ध्यान खींचती है,लेकिन उसी परिसर में शिक्षा का मंदिर बदहाली और उपेक्षा का दर्द झेल रहा है. यह दृश्य केवल एक विद्यालय की समस्या नहीं,बल्कि ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की उस सच्चाई को उजागर करता है. जिसे वर्षों से नजरअंदाज किया जाता रहा है.

दो कमरों में आठ वर्गो की पढ़ाई


विद्यालय में पहली से आठवीं तक की कक्षाएं संचालित होती हैं.लेकिन पढ़ाई के लिए मात्र दो कमरे उपलब्ध हैं.एक कमरे में पांचवीं और छठी वर्ग की कक्षाएं साथ चलती हैं. जबकि दूसरे कमरे में सातवीं और आठवीं के छात्र-छात्राओं को पढ़ाया जाता है.

तीसरी और चौथी कक्षा के बच्चे बरामदे में बैठकर पढ़ते हैं,वही पहली और दूसरी कक्षा की पढ़ाई मंदिर परिसर में संचालित होती है.बारिश के दिनों में बरामदे में पढ़ने वाले बच्चों की स्थिति और भी खराब हो जाती है. फर्श गीले हो जाते हैं,बच्चे सिकुड़कर बैठते हैं और किसी तरह पढ़ाई जारी रहती है.गर्मी, ठंड और बरसात हर मौसम में बच्चों को कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है.

वर्गकक्ष ही बना कार्यालय

विद्यालय की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां प्रधानाध्यापक कक्ष तक नहीं है.जिस कमरे में बच्चों की पढ़ाई होती है,उसी में विद्यालय का कार्यालय भी संचालित होता है.शिक्षकों के बैठने तक की समुचित व्यवस्था नहीं है.आज जब स्मार्ट क्लास और डिजिटल शिक्षा की बातें हो रही हैं,तब यह विद्यालय मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है.

1957 से अब तक क्यों नहीं बना भवन

सबसे बड़ा सवाल यही है कि सात दशक बीत जाने के बाद भी विद्यालय को अपना भवन क्यों नहीं मिल सका.इस दौरान कई सरकारें बदलीं,कई जनप्रतिनिधि आए और गए, लेकिन विद्यालय की तस्वीर नहीं बदली.स्थानीय लोगों के अनुसार कई बार भवन निर्माण की मांग उठी,लेकिन मामला फाइलों और आश्वासनों से आगे नहीं बढ़ पाया.चुनाव के समय शिक्षा और विकास के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर स्थिति जस की तस बनी रहती है.

मंदिर भव्य,शिक्षा का मंदिर बदहाल

विद्यालय परिसर में स्थित शिव-पार्वती मंदिर काफी भव्य और व्यवस्थित है.धार्मिक आयोजनों में यहां बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं,लेकिन उसी परिसर में शिक्षा का मंदिर उपेक्षा का दंश झेल रहा है.यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है क्या समाज की प्राथमिकताओं में शिक्षा पीछे छूट गई है.


क्या बच्चों का भविष्य धार्मिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं से कम महत्वपूर्ण हो गया है.इधर गांव के बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि समय रहते समाज और जनप्रतिनिधियों ने गंभीर पहल की होती तो आज बच्चों को ऐसी परिस्थितियों में पढ़ाई नहीं करनी पड़ती.

विपरीत परिस्थितियों में भी डटे हैं शिक्षक

विद्यालय की सबसे बड़ी ताकत यहां के शिक्षक हैं.जो तमाम अभावों के बावजूद बच्चों के भविष्य को संवारने में जुटे हुए हैं.प्रभारी प्रधानाध्यापिका इन्द्राणी कुमारी सीमित संसाधनों के बीच भी विद्यालय के संचालन और बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं.उनके साथ शिक्षक अवनीश कुमार वर्मा,चन्द्रभूषण,अंकित मिश्रा,संगीता कुमारी,मिन्टु कुमारी,कुमारी नीतु एवं पूनम कुमारी कठिन परिस्थितियों में भी शिक्षा की अलख जगा रहे हैं.

करीब दो सौ बच्चों का भविष्य इन आठ शिक्षकों के भरोसे है.कई बार एक ही समय में दो-दो वर्गों को संभालना पड़ता है.शोर,भीड़ और संसाधनों की कमी के बीच पढ़ाना आसान नहीं,लेकिन शिक्षक अपने दायित्व से पीछे नहीं हटते.

गरीब बच्चों के सपनों पर भारी व्यवस्था की लापरवाही

विद्यालय में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं.माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाकर बेहतर भविष्य देना चाहते हैं,लेकिन विद्यालय पहुंचने पर बच्चों को बैठने तक की समुचित व्यवस्था नहीं मिलती.एक ओर सरकार सब पढ़ें,सब बढ़ें का नारा देती है, दूसरी ओर ग्रामीण विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव व्यवस्था की सच्चाई बयान करता है.

जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल

स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों,जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. विद्यालय की समस्या कोई नई नहीं है,लेकिन वर्षों से इस दिशा में गंभीर पहल नहीं हो सकी.गांव में सड़क,नाली और अन्य योजनाओं पर चर्चा होती है,लेकिन विद्यालय भवन का मुद्दा हमेशा उपेक्षित रह जाता है.ग्रामीणों का कहना है कि यदि सामूहिक प्रयास हो तो विद्यालय के लिए भूमि और भवन दोनों की व्यवस्था संभव है.

अब ठोस पहल की जरूरत

उत्क्रमित मध्य विद्यालय मेघौल कन्या की स्थिति अब केवल एक समाचार नहीं,बल्कि बच्चों के भविष्य से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुकी है.जरूरत है कि जिला प्रशासन,शिक्षा विभाग,जनप्रतिनिधि और समाज मिलकर इस दिशा में ठोस पहल करें.विद्यालय के लिए स्थायी भवन,पर्याप्त वर्गकक्ष, कार्यालय,पुस्तकालय,शौचालय और खेल मैदान जैसी मूलभूत सुविधाएं तत्काल उपलब्ध कराई जानी चाहिए.यदि अब भी इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाली पीढ़ियां व्यवस्था की इस लापरवाही की कीमत चुकाती रहेंगी.

आखिर कब मिलेगा शिक्षा के इस मंदिर को सम्मान

69 वर्षों से बिना भवन के चल रहा यह विद्यालय आज भी उम्मीद लगाए बैठा है कि शायद किसी दिन व्यवस्था जागेगी, कोई जनप्रतिनिधि संवेदनशील होगा और बच्चों को उनका अधिकार मिलेगा.शिव-पार्वती मंदिर की छाया में चल रही यह पाठशाला आज केवल शिक्षा नहीं,बल्कि संघर्ष,धैर्य और उपेक्षा की कहानी कह रही है.

अब देखना यह है कि सरकार, प्रशासन और समाज इस पुकार को कब सुनता है.क्योंकि सवाल केवल एक विद्यालय का नहीं,बल्कि उन मासूम सपनों का है.जो हर दिन बरामदे और मंदिर की चौखट पर बैठकर अपने भविष्य का इंतजार कर रहे हैं.

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विवेक सिंह

लेखक के बारे में

By विवेक सिंह

विवेक सिंह की डिजिटल मीडिया और जनसरोकारों से जुड़े विषयों में विशेष रुचि रही है. वर्तमान में वे प्रभात खबर डिजिटल में कार्यरत हैं. वे बिहार के मिथिला क्षेत्र के निवासी हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रूप से योगदान दे रहे हैं.

उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की पढ़ाई की है. शिक्षा के दौरान उन्होंने रिपोर्टिंग, समाचार लेखन, डिजिटल मीडिया, जनसंचार, फोटो जर्नलिज्म, मोबाइल जर्नलिज्म (MOJO) और मीडिया रिसर्च की गहन समझ विकसित की है. अध्ययन के दौरान उन्होंने दूरदर्शन (Doordarshan) में इंटर्नशिप भी की, जहां उन्हें न्यूजरूम की कार्यप्रणाली, टीवी समाचार निर्माण, स्क्रिप्ट लेखन, विजुअल चयन, फील्ड रिपोर्टिग और प्रसारण प्रक्रिया को नजदीक से समझने का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ.

पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने मीडिया प्लेटफॉर्म The Newsdharma के माध्यम से ग्राउंड रिपोर्टिंग, जनमत संग्रह (Public Opinion), सामाजिक मुद्दों की कवरेज और स्थानीय समाचारों के संकलन का व्यापक अनुभव प्राप्त किया. उन्होंने विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और जनहित से जुड़े विषयों पर जमीनी स्तर से रिपोर्टिंग करते हुए आम लोगों की आवाज को प्रमुखता से सामने लाने का कार्य किया है.

इसके साथ ही वे NGO Amar Shaheed Bipin Singh Foundation से जुड़कर सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं. स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता, युवा सशक्तिकरण, धार्मिक और जनकल्याण से जुड़े अभियानों में उनकी विशेष भागीदारी रही है. समाज के विभिन्न वर्गों के बीच जागरूकता फैलाने और सकारात्मक बदलाव लाने के प्रयासों में वे निरंतर योगदान देते रहे हैं.

वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में कार्यरत विवेक सिंह राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, रोजगार, खेल, अपराध, रियल-टाइम समाचारों, सामाजिक सरोकारों और समसामयिक विषयों से जुड़ी खबरों पर लेखन करते हैं. डिजिटल पत्रकारिता के साथ-साथ उन्हें SEO (Search Engine Optimization), कंटेंट प्लानिंग और ट्रेंड-आधारित समाचार लेखन की अच्छी समझ है. ब्रेकिंग न्यूज की पहचान, त्वरित कवरेज और कम समय में तथ्यपरक समाचार तैयार करना उनकी प्रमुख कार्यक्षमताओं में शामिल है.

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