मधुश्रावणी व्रत से भक्तिमय हुआ माहौल, भाई के हाथों उठती हैं नवविवाहिताएं, जानिए इस अनूठी परंपरा का महत्व

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पूजा-अर्चना करतीं नवविवाहिता. | Prabhat Khabar Network

Madhushravani Vrat : मिथिलांचल में नवविवाहिताओं द्वारा किया जाने वाला मधुश्रावणी व्रत अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन की कामना का प्रतीक है. यह व्रत मां पार्वती से प्रेरित है और भाई-बहन के अटूट प्रेम को भी दर्शाता है.

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Madhushravani Vrat : प्रखंड क्षेत्र में इन दिनों मधुश्रावणी व्रत को लेकर माहौल पूरी तरह भक्तिमय बना हुआ है. खासकर मैथिल ब्राह्मण परिवारों में सावन से पहले विवाह करने वाली नवविवाहिताएं अपने वैवाहिक जीवन के पहले सावन में इस पारंपरिक व्रत और पूजा-अनुष्ठान को पूरी श्रद्धा के साथ निभा रही हैं. मान्यता है कि मधुश्रावणी व्रत के माध्यम से नवविवाहिता अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की समृद्धि की कामना करती हैं.

मां पार्वती से जुड़ी है मधुश्रावणी की मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मधुश्रावणी व्रत की शुरुआत मां पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने और अखंड सौभाग्य की कामना से की थी. तभी से यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है. व्रत के दौरान नवविवाहिताएं नियमित रूप से पूजा-अर्चना करती हैं और विभिन्न पौराणिक एवं धार्मिक कथाओं का श्रवण करती हैं.

पूजा में नागदेवता, भगवान शिव, मां पार्वती और नंदी की विधिवत आराधना की जाती है. पूजा के बाद ससुराल पक्ष से भेजे गए विभिन्न पकवानों को प्रसाद के रूप में कथा सुनने पहुंची महिलाओं एवं अन्य लोगों के बीच वितरित किया जाता है.

महिलाओं के हाथ में होती है पूजा की पूरी जिम्मेदारी

मधुश्रावणी की सबसे खास विशेषता यह है कि इसके अधिकांश धार्मिक अनुष्ठान महिलाओं द्वारा ही संपन्न कराए जाते हैं. पूजा की सामग्री जुटाने से लेकर नवविवाहिता को पूजा कराने और धार्मिक कथा सुनाने तक की जिम्मेदारी महिलाएं निभाती हैं. कई स्थानों पर महिला पुरोहित ही नवविवाहिताओं को मधुश्रावणी की कथा का श्रवण कराती हैं.

इस दौरान घर में पारंपरिक गीतों, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों से उत्सवी माहौल बना रहता है. नवविवाहिता भी पूरे नियम और श्रद्धा के साथ व्रत का पालन करती हैं.

भाई के हाथ से उठती है बहन, रिश्ते की दिखती है खूबसूरत तस्वीर

मधुश्रावणी की परंपराओं में भाई-बहन के रिश्ते की भावनात्मक झलक भी देखने को मिलती है. प्रत्येक दिन पूजा के आसन पर बैठी नवविवाहिता को उसका भाई हाथ पकड़कर पूजा स्थल से उठाता है. इस परंपरा को भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है.

यही वजह है कि मधुश्रावणी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने वाली लोकपरंपरा के रूप में भी देखी जाती है.

समापन पर मायके और ससुराल की परंपराओं का संगम

मधुश्रावणी पूजा के समापन दिवस पर नवविवाहिता के ससुराल पक्ष से नए वस्त्र, आभूषण और अन्य सामग्री भेजने की परंपरा है. परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए भी नए परिधान भेजे जाते हैं. इस अवसर पर घर-परिवार में उत्सव जैसा माहौल रहता है और नवविवाहिता के सुखी वैवाहिक जीवन की मंगलकामना की जाती है.

लोक परंपरा, धार्मिक आस्था, भाई-बहन के प्रेम और मायके-ससुराल के रिश्तों का यह अनूठा संगम मधुश्रावणी को मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है.


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अजय कुमार झा

लेखक के बारे में

By अजय कुमार झा

अजय कुमार झा प्रिंट माध्यम में 14 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 4 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. बाराहाट (बांका) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक गतिविधि, खेल, इतिहास और राजनीतिक गतिविधियों की खबरों में रुचि रखते हैं.

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