मंत्रोच्चर से भक्तिमय हुआ माहौल
नवशक्ति का पहला स्वरूप शैलपुत्री की पूजा कलश स्थापन के साथ आरंभ बांका: आस्था, भक्ति व उल्लास का महापर्व दुर्गापूजा शनिवार से आरंभ हो गया. मंदिरों में नवरात्र पर नवदुर्गा की आराधना आरंभ हो गयी. नव शक्ति का पहला स्वरुप शैलपुत्री की पूजा कलश स्थापना के साथ आरंभ हो गयी. घर में भी नेम निष्ठा […]
नवशक्ति का पहला स्वरूप शैलपुत्री की पूजा कलश स्थापन के साथ आरंभ
बांका: आस्था, भक्ति व उल्लास का महापर्व दुर्गापूजा शनिवार से आरंभ हो गया. मंदिरों में नवरात्र पर नवदुर्गा की आराधना आरंभ हो गयी. नव शक्ति का पहला स्वरुप शैलपुत्री की पूजा कलश स्थापना के साथ आरंभ हो गयी. घर में भी नेम निष्ठा के साथ लोग पूजा अर्चना में डूबे रहे. शहर के पुरानी ठाकुर बाड़ी, करहरिया, विजय नगर, ककवारा, समुखिया मोड़ वहीं बौंसी के पुरानी हाट परिसर दुर्गा मंदिर, दुमका रोड मंदिर, मनियारपुर साढ़ामोड़, श्याम बाजार, कैरी, कुड़रो सहित अन्य दुर्गा मंदिरों में देवी की प्रतिमा व कलश स्थापित की गयी. देवी दुर्गा के मंत्रोच्चर से वातावरण भक्तिमय बना हुआ है.
वर्षा से खरीदारी प्रभावित
शहर का डोकानिया मार्केट एक ही बरसात में पानी-पानी हो गया. शनिवार दोपहर हुई बारिश से पूरा बाजार जलमगA हो गया. देर शाम तक भी बाजार की गलियां पानी में डूबी रही जिससे राहगीरों को आने जाने में भारी परेशानी उठानी पड़ी. कई दुकानों में भी पानी घुस गया जिससे दुकानदारों को परेशानी उठानी पड़ी. पानी को लेकर पहली पूजा के अवसर पर दुकान से चहल गायब रही. दुकानदारों ने कहा कि बाजार में जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं है जिससे आये दिन ऐसी परेशानी उठानी पड़ती है.
दूध की धार पर चल कर आयी थीं दुर्गा मां
अजय कुमार झा, पंजवारा. शक्ति रुपा देवी दुर्गा की भक्ति में शनिवार से लोग सराबोर हो गये हैं. हर तरफ भक्ति में डूबे लोग मैया की आराधना में लीन हैं. वहीं क्षेत्र के बभनगामा पंचायत में दुर्गा पूजा अपने खास अंदाज के लिये जाना जाता है. विगत 1921 से हो रही यहां मां दुर्गा की पूजा बिना बली के ही होती आ रही है.
जानकार बताते हैं कि गांव के एक वृद्ध भक्त गणोरी मंडल को जब रात में देवी मां ने स्वपA दिया की मैं मंदार पर तुम्हारा इंतजार कर रही हूं. तो कई लोगों ने उसे सरफिरा कह कर उसका मजाक उड़ाया, लेकिन उसने हार नहीं मानी. अपने फूलधरिया के साथ वह मंदार पर्वत पर पर चले गये.
स्वप्न में बताये गये देवी के स्थान पर उन्हे खोजा वो वहां नही मिली.थक हार कर भक्त के साथ उनका फूलधरिया एवं कुछ गांव वाले लौट आये.उसी रात फिर देवी ने गणोरी को स्वप्न दिया और कहा मैं तो वहीं थी तुमने खोज ही नही पाया हमें.सुबह फिर वो जुनूनी भक्त मंदार पर्वत पर पहुंचा और इस बार उसे देवी के रुप वाली प्रतिमा शीला पर उत्खचित मिली. जैसे ही ये खबर गांव तक पहुंची सभी लोग जैसे तैसे मंदार पहुंचे. बुजूर्ग बताते हैं देवी मां की शिला को काफी नेम निष्ठा से बैल गाड़ी पर रखा गया. गाजे बाजे के साथ आगे आगे गाय के दूध की धारा भक्त गिराते रहे और बैल गाड़ी इसी तरह बभनगामा पहुंची. लोगों ने तब से पूजा करनी शुरु कर दी. काफी दिनों बाद गांव के ही एक घर में जुड़वां बेटे का जन्म हुआ.
उसी खुशी में उस दंपती ने 1935 से देवी की प्रतिमा बना कर दुर्गा पूजा करनी आंरभ की. जो वर्तमान समय में जारी है.आज उस स्थान पर गांव वालों ने एक भव्य मंदिर का निर्माण करा दिया है. भक्त बताते हैं कि यहां मनौती पूरी होने पर मईया को पांच फलों की बलि दी जाती है जिसमें बेल, परोल, बनिया कोढ़ा, ईख प्रमुख रुप से शामिल है. दशहरा के मौके पर ग्रामीण युवकों द्वारा नाटक के मंचन के साथ कई खेल तमाशे वाले भी यहां पहुचं कर अपनी कला दिखाते हैं.
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