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न फुटबॉल, न मैदान, कपड़े का बॉल बना खेलते हैं गांव के बच्चे

Updated at : 04 Apr 2019 5:12 AM (IST)
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न फुटबॉल, न मैदान, कपड़े का बॉल बना खेलते हैं गांव के बच्चे

बांका : फुल्लीडुमर प्रखंड क्षेत्र के तेतरकोला का एक बालक पास के मैदान में कपड़ा के बने फुटबॉल पर किक मार रहा है. पूछने पर बालक ने बताया कि फुटबॉल के साथ फुटबॉल किट नहीं है. मजबूरन फटा-चिटा कपड़ा का फुटबॉल बनाकर खेलना पड़ता है. पसीने से तर-बतर बालकों ने बताया कि इसमें असली फुटबॉल […]

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बांका : फुल्लीडुमर प्रखंड क्षेत्र के तेतरकोला का एक बालक पास के मैदान में कपड़ा के बने फुटबॉल पर किक मार रहा है. पूछने पर बालक ने बताया कि फुटबॉल के साथ फुटबॉल किट नहीं है. मजबूरन फटा-चिटा कपड़ा का फुटबॉल बनाकर खेलना पड़ता है. पसीने से तर-बतर बालकों ने बताया कि इसमें असली फुटबॉल वाला उछाल तो नहीं है, परंतु फिर भी खेले बिना नहीं रह पाते हैं.

दरअसल, आदिवासी समाज में फुटबॉल एक सभ्यता-संस्कृति के रुप में समाया है. मसलन, फुटबॉल के पीछे आदिवासी युवाओं की दीवानगी बचपन अवस्था से ही उनके मन में विकसित होती है.
लेकिन, मौजूदा हालत में आदिवासी गांव में न तो दुरुस्त मैदान है और न ही फुटबॉल किट. अलबत्ता, आदिवासी युवा जैसे-तैसे फुटबॉल को जिंदा रखने की जद्दोजहद करते रहते हैं. मौजूदा परिदृश्य में यह सवाल काफी फिट बैठ रहा है.
दरअसल, लोकसभा चुनावी समर में प्रत्येक प्रत्याशी एक-एक गांव में घूम-घूमकर वोट मांग रहे हैं. दिलचस्प बात यह भी है कि सभी समाज के लोग व उनका वोट हरेक प्रत्याशियों के लिए महत्वपूर्ण है. बांका लोकसभा क्षेत्र में आदिवासी समाज की संख्या बेहतर स्थिति में है. यानि 60-70 हजार आदिवासी आबादी चुनाव को सियासी मोड़ जरुर दे सकता है. यही नहीं यह संजीवनी के रुप में भी काम कर सकता है.
जिला के कटोरिया, चांदन, फुल्लीडुमर व बौंसी के कुछ क्षेत्र में आदिवासी की पैठ अच्छी है, लेकिन आदिवासी समाज आज भी अपनी मूल समस्याओं से छुटकारा नहीं पा सका है. खेल के मैदान से लेकर पेयजल की समस्या आज भी जस की तस बनी हुयी है. चिंताजनक बात यह है कि आदिवासियों की समस्या को लेकर किसी भी प्रत्याशी व दल में कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है.
गर्मी में अक्सर आदिवासी समाज की सूखी रह जाती है हलक
गर्मी का मौसम शुरु है. बस एक बार आदिवासी गांव चले जाइये. प्यास आपको बेचैन कर देगा. ऐसी हालत से प्रति वर्ष आदिवासी समाज जूझता रहता है. आदिवासी समाज के लोगों के मुताबिक प्रत्येक वर्ष चेत, वैशाख और जेठ की तपती धूप में पानी की घनघोर समस्या उत्पन्न हो जाती है. पहाड़ व जंगली इलाका होने की वजह से पाताल में भी ढूंढने से बूंद-बूंद भर पानी के लिए मशक्कत करनी पड़ती है.
आज भी ज्यादातर इलाके का कुआं व चापाकल में पानी खत्म हो गया है. अलबत्ता, दूर-दराज गांव से प्रतिदिन साइकिल सहित अन्य वाहन से पानी लाना होता है. किसी-किसी इलाके में पानी 400 फिट नीचे तक जा चुका है. लिहाजा, पानी की समस्या को लेकर भी नेताजी को गंभीर रहना होगा.
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